पूनम शर्मा
भारत की न्यायपालिका लंबे समय से एक ऐसे संकट का सामना कर रही थी, जिसे आम लोग खुलकर तो नहीं बोलते थे, लेकिन हर किसी की आंतरिक पीड़ा थी — क्या सुप्रीम कोर्ट कुछ चुनिंदा बड़े वकीलों की पकड़ में है? क्या देश की सबसे बड़ी अदालत में तारीखें तय करने का अधिकार भी एक विशेष ‘लॉबी’ के हाथ में था? बीते कई वर्षों में देश की जनता ने कई ऐसी घटनाएँ देखीं, जिनसे यह सवाल और गहरा हुआ —
कभी आधी रात को अचानक सुनवाई, कभी गर्मियों की छुट्टियों में विशेष बैठकों का आयोजन, कभी एक ही सेट के वकील हर बड़े केस में सामने, और कभी आम याचिकाकर्ता को डांटकर वापस भेज दिए जाना।
इसी पृष्ठभूमि में भारत के नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 1 दिसंबर 2025 से लागू होने वाला एक ऐसा ऐतिहासिक सुधार पेश किया है, जिसने सुप्रीम कोर्ट की पूरी व्यवस्था को हिला दिया है। यह सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मानसिक क्रांति है — “अब सुप्रीम कोर्ट कुछ वकीलों की नहीं, देश की जनता की अदालत होगा।”
क्या बदला? चार सर्कुलर जिन्होंने अदालत की व्यवस्था उलट दी
जस्टिस सूर्यकांत ने चार बड़े सर्कुलर जारी किए, जिनका प्रभाव सीधा आम जनता और युवा वकीलों पर पड़ेगा।
1. मेंशनिंग अब जूनियर वकील करेंगे, सीनियर को रोक
अब कोई भी बड़ा वकील — चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो — न्यायालय को आकर यह नहीं कह पाएगा कि “My Lords, हमारी सुनवाई आज ही कर दीजिए।”
सीनियर वकील मेंशनिंग नहीं कर सकेंगे।
मेंशनिंग सिर्फ Advocate-on-Record या जूनियर वकील कर सकेंगे।
इससे दो बड़े फायदे होंगे —
बड़े वकीलों का वर्चस्व टूटेगा
युवा वकीलों को असली अवसर मिलेगा
2. अर्जेंट मामलों की स्वतः लिस्टिंग – दो कार्य दिवस में
अब किसी ‘टॉप लॉबी’ की जरूरत नहीं।
यदि मामला इन श्रेणियों में है:
मौलिक अधिकार
व्यक्तिगत स्वतंत्रता
हैबियस कॉर्पस
मौत की सजा
अग्रिम जमानत
तत्काल गिरफ्तारी का खतरा
तो यह खुद-ब-खुद दो दिनों में लिस्ट हो जाएगा।
3. ‘तारीख पर तारीख’ का खेल खत्म
तारीख तराशने का खेल, जिसे देश भर के लोग गुस्से में “तारीख पर तारीख वाला सिस्टम” कहते थे, उसे समाप्त कर दिया गया है।
अब तारीख सिर्फ इन परिस्थितियों में मिलेगी:
वकील की वास्तविक मेडिकल इमरजेंसी
याचिकाकर्ता के परिवार में गंभीर हादसा
कोई अपरिहार्य परिस्थिति
“वकील बीज़ी है” — यह अब बहाना नहीं चलेगा।
4. ‘फिक्सर्स’ और लॉबी संस्कृति पर सीधे प्रहार
सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से यह शिकायत थी कि पाँच–छह बड़े वकील ही
अदालत की मेंशनिंग
केस की लिस्टिंग
बेंच चयन
तारीख प्रबंधन
सब कुछ नियंत्रित करते थे।
जस्टिस सूर्यकांत ने इस व्यवस्था को खत्म करने का सीधा फैसला लिया। अब कोई नहीं कह सकेगा कि “हमारी लॉबी है, हमारी सुनवाई आज ही करा दो।”
क्यों यह बदलाव ऐतिहासिक माना जा रहा है?
भारत की जनता ने पहली बार खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर सवाल उठाए।
पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिनसे आम लोगों में विश्वास डगमगाया —
आधी रात में स्पेशल सुनवाई
तेजतर्रार वकीलों की ‘एकाधिकार संस्कृति’
आम याचिकाकर्ताओं को उपेक्षा
एक पूर्व CJI द्वारा याचिकाकर्ता को कहा गया – “जाओ अपने भगवान से प्रार्थना करो”इन घटनाओं ने न्यायपालिका पर यह आरोप मजबूत किया कि
“यह अदालत कुछ लोगों के लिए है, जनता के लिए नहीं।” लेकिन जस्टिस सूर्यकांत ने इस धारणा को पलटने का प्रयास किया है। एक ग्रामीण परिवेश से आए CJI का साहस ,जस्टिस सूर्यकांत किसी जज परिवार से नहीं आते। न ही उनके चाचा, पिता, मामा कोई न्यायाधीश थे। हरियाणा के ग्रामीण परिवेश से उठकर वे सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष तक पहुँचे हैं। इसलिए वे उस आम वकील का दर्द समझते हैं जिसकी आवाज़ कभी सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुँचती थी।
उनका कहना है:
“सुप्रीम कोर्ट अब जनता की अदालत होगी — न कि किसी लॉबी की।”
युवा वकीलों के लिए सबसे बड़ा अवसर ,सालों तक यह शिकायत रही कि सुप्रीम कोर्ट में वही वकील आगे बढ़ पाते हैं जिनके परिवार में पहले से बड़े वकील हों या जिनके पास करोड़ों रुपये हों। इस व्यवस्था में बदलाव करके जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि अब युवा वकीलों को समान अवसर मिलेगावे मेंशनिंग कर सकेंगे, कोर्ट-ऑन-रिकॉर्ड वकीलों की शक्ति बढ़ेगी, नए वकील न्यायिक प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाएँगे I
आम जनता पर असर — न्याय अब पहुँच के भीतर
सबसे बड़ा लाभ आम नागरिक को मिलेगा। अब अदालत में पहुँचने के लिए बड़े वकील उनकी फीस,उनकी लॉबी इनमें से किसी पर निर्भरता नहीं होगी।व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तोस्वतः-संचालित लिस्टिंगजनता के लिए एक वरदान साबित होगी।क्या 1 दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह बदल जाएगा? पूरी व्यवस्था एक दिन में नहीं बदलती। लेकिन यह कदम उस दिशा में एक विशाल छलांग है।
1 दिसंबर से आप कई बदलाव देखेंगे:
लॉबी आधारित मेंशनिंग खत्म
स्वतः लिस्टिंग
तारीखों का दुरुपयोग समाप्त
वकीलों का एकाधिकार खत्म
न्यायपालिका की पारदर्शिता बढ़ेगी
यह वह सुधार है जिसका लोग वर्षों से इंतज़ार कर रहे थे।
निष्कर्ष: न्यायपालिका की ‘जनता के प्रति जिम्मेदारी’ का नया युग
यह कदम सुप्रीम कोर्ट में
जनता का विश्वास पुनर्स्थापित करेगा।
और यह संदेश देता है कि
भारत की सर्वोच्च अदालत
अब सिर्फ शक्तिशाली वकीलों की नहीं,
बल्कि हर नागरिक की अदालत है।
जस्टिस सूर्यकांत ने जो निर्णय लिया है, वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।