क्या चेन्नई की एक शादी तोड़ पाएगी DMK-कांग्रेस का सियासी गतिरोध?

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पूनम शर्मा
राजनीति में कई बार औपचारिक बैठकों से ज्यादा असर अनौपचारिक मुलाकातों का होता है। तमिलनाडु की राजनीति में आज ऐसा ही एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिल सकता है, जहां एक पारिवारिक शादी समारोह सत्ता और रणनीति का मंच बन गया है।

तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सेल्वापेरुन्थगई की बेटी की शादी में मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की मौजूदगी सिर्फ सामाजिक शिष्टाचार नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे DMK और कांग्रेस के बीच चल रहे सीट बंटवारे के गतिरोध को सुलझाने की संभावित कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, स्टालिन ने DMK सांसद कनिमोझी को भी इस अहम बातचीत के लिए बुलाया है।

सीट बंटवारे पर अटकी बातचीत

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और गठबंधन की राजनीति अपने निर्णायक मोड़ पर है। DMK, जो राज्य में सत्तारूढ़ दल है, कथित तौर पर कांग्रेस को 25 से 27 सीटें और एक राज्यसभा सीट देने को तैयार है।

दूसरी ओर कांग्रेस की शुरुआती मांग 35 से 45 सीटों के बीच बताई गई, हालांकि अब 32 सीटों तक आने की लचीलापन भी दिखाई दे रहा है। लेकिन यह फासला अभी भी कम नहीं हुआ है।

कांग्रेस के भीतर भी यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं ज्यादा सख्त रुख पार्टी को ही नुकसान न पहुंचा दे। कई नेता मानते हैं कि तमिलनाडु में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन DMK के साथ गठबंधन पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में लंबी खींचतान पार्टी की स्थिति को कमजोर कर सकती है।

मध्यस्थ की भूमिका में चिदंबरम

इस पूरे घटनाक्रम में पी. चिदंबरम की भूमिका अहम मानी जा रही है। तमिलनाडु से आने वाले वरिष्ठ नेता होने के कारण उनके DMK नेतृत्व से पुराने और सहज संबंध हैं। बताया जा रहा है कि DMK नेतृत्व कांग्रेस के मौजूदा वार्ताकारों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है और चिदंबरम को एक भरोसेमंद और व्यावहारिक सेतु के रूप में देख रहा है।

शादी समारोह में स्टालिन और चिदंबरम की संभावित मुलाकात को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि औपचारिक वार्ताओं की तुलना में ऐसे निजी माहौल में अधिक खुलकर बातचीत हो सकती है, जहां न तो मीडिया का दबाव हो और न ही बयानबाजी का शोर।

 राजसभा सीट बना सौदेबाजी का केंद्र

सूत्रों के अनुसार, DMK राज्यसभा की एक सीट को बातचीत का अहम हिस्सा बना रही है। कांग्रेस को संकेत दिया गया है कि यदि 6 मार्च तक कोई सहमति नहीं बनती है, तो उसे इस बार ऊपरी सदन की सीट से हाथ धोना पड़ सकता है और अगली बार का इंतजार करना होगा।

यह प्रस्ताव कांग्रेस के लिए आकर्षक भी है और दबाव का कारण भी। एक ओर राज्यसभा में प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की उपस्थिति मजबूत करता है, तो दूसरी ओर विधानसभा सीटों की संख्या सीधे राज्य की राजनीतिक ताकत तय करती है।

गठबंधन की मजबूरी या रणनीतिक संतुलन?

तमिलनाडु की राजनीति में DMK और कांग्रेस का गठबंधन नया नहीं है। दोनों दलों ने अतीत में मिलकर चुनाव लड़े हैं और भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा खड़ा किया है। लेकिन हर चुनाव से पहले सीट बंटवारे को लेकर तनाव भी उतना ही स्वाभाविक रहा है।

इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि चुनाव बेहद करीब हैं और समय तेजी से निकल रहा है। कांग्रेस के लिए यह आत्मसम्मान और राजनीतिक प्रासंगिकता का सवाल है, जबकि DMK के लिए अपनी मजबूत स्थिति बरकरार रखना प्राथमिकता है।

ऐसे में चेन्नई की यह शादी महज एक पारिवारिक उत्सव नहीं रह गई है। यह एक ऐसा मंच बन गई है जहां मुस्कुराहटों के बीच सियासी समीकरण तय हो सकते हैं।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या यह अनौपचारिक मुलाकात औपचारिक समझौते का रास्ता खोलेगी, या फिर सीट बंटवारे का यह गतिरोध चुनावी रणभूमि तक खिंचता चला जाएगा। राजनीति में कभी-कभी रिश्तों की गर्माहट ही ठंडे पड़ते समीकरणों को फिर से जीवंत कर देती है — और शायद चेन्नई की यह शाम उसी कहानी की शुरुआत बने।

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