भारत में लंग कैंसर तेजी से बढ़ा, पर स्क्रीनिंग ज़ीरो, क्या यह स्वास्थ्य आपातकाल नहीं?

भारत में फेफड़ों का कैंसर अब सिर्फ़ स्मोकर्स नहीं, बल्कि हर सांस लेने वाले की बीमारी बन चुका है; युवा महिलाएँ भी एडवांस स्टेज में पहुंच रही हैं।

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  • गैर-धूम्रपान करने वाले मरीजों में लंग कैंसर के मामले तेजी से बढ़े, हर तीन में से एक नॉन-स्मोकर
  • 20–35 वर्ष की महिलाओं में भी एडवांस स्टेज के केस
  • भारत में कोई राष्ट्रीय लंग-कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम नहीं
  • आधुनिक उपचार महंगे, 99% भारतीयों की पहुंच से बाहर

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 20 नवंबर: नवंबर को दुनिया भर में लंग कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है। अमेरिका और यूरोप में सफेद रिबन पहनकर मरीजों और डॉक्टरों के प्रति एकजुटता जताई जाती है। लेकिन भारत में स्थिति सबसे गंभीर होने के बावजूद, यह महीना लगभग खामोशी में गुजर जाता है। दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में से 93 भारत में हैं, और यहाँ नॉन-स्मोकर्स में फेफड़ों के कैंसर का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।

भारत में हर तीन में से एक मरीज ने कभी धूम्रपान नहीं किया। डॉक्टरों का कहना है कि अब 20–30 साल की युवा महिलाएँ भी स्टेज-III और स्टेज-IV में पहुँच रही हैं। यह अब स्मोकर्स का रोग नहीं, बल्कि सांस लेने वालों की बीमारी बन चुका है, जिसकी जड़ में है जहरीली हवा।

“348 AQI” पर खुशी क्यों? यह तो आपदा है

दिल्ली ने इस साल नवंबर में “तीन सालों में सबसे कम औसत AQI” के 348 पर जश्न मनाया। लेकिन WHO के अनुसार annual PM2.5 स्तर 5 µg/m³ से अधिक नहीं होना चाहिए। इस तुलना में दिल्ली की हवा खतरनाक नहीं, प्रलयकारी है।

कोई भी दिल्ली लैंड करता है तो विमान का दरवाज़ा खुलते ही धुएं की गंध महसूस हो जाती है। आपको मॉनिटर की जरूरत नहीं पड़ती,आपके फेफड़े खुद बता देते हैं कि हवा में जहर है।

न्यायपालिका के बयान और जनता की वास्तविकता

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि “दिल्ली को बंद नहीं किया जा सकता” लाखों लोगों की उस पीड़ा को अनदेखा करता है, जो पहले ही इस जहरीली हवा से बीमार, बेबस और कम उम्र जीने को मजबूर हैं।

विडंबना देखिए—जिन्हें लगता है कि प्रदूषण इतना बड़ा मुद्दा नहीं, वही इन दिनों वर्चुअली अदालतों में उपस्थित हो रहे हैं। साधारण लोग कहाँ जाएँ?

एक व्यक्तिगत कीमत

दिल्ली में 10 साल रहने के बाद, एक 35 वर्षीय महिला को स्टेज-4 नॉन-स्मोकर लंग कैंसर का पता चला। वह लिखती हैं कि उन्होंने अपना करियर भारत की पब्लिक हेल्थ बेहतर करने में लगाया, लेकिन जिस हवा को वे रोज़ सांस में लेती थीं, उसने उनकी उम्र के कई दशक उनसे छीन लिए।

भारतीय समाज ने अक्टूबर से जनवरी तक की “सीजनल माइग्रेशन” को सामान्य बना दिया है, जहाँ अमीर लोग दिल्ली छोड़कर साफ़ हवा वाले शहरों में चले जाते हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यही है: दिल्ली में सभी मर रहे हैं, बस कोई जल्दी, कोई धीरे।

भारत मापता ही नहीं, तो समझेगा कैसे?

EGFR, ALK, ROS जैसे ऑन्कोजीन-ड्रिवन कैंसर की पहचान के लिए नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग जरूरी है।
कितने अस्पतालों में यह सुविधा है?
कितने मरीज इसे वहन कर सकते हैं?
कितनों को इसके बारे में जानकारी है?

जब जांच ही नहीं होती, रजिस्ट्रियां अधूरी हैं, तो हम कैसे मान लें कि ये कैंसर “दुर्लभ” हैं?

इलाज की असमानता, एक नैतिक विफलता

टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी, जो लंग कैंसर मरीजों के लिए जीवनदान हैं भारत में अत्यधिक महंगी हैं। 99% भारतीय इन्हें वहन नहीं कर सकते।

सरकारी योजनाएँ अब भी पुरानी कीमोथेरेपी पर अटकी हैं, जबकि आधुनिक दुनिया कहीं आगे निकल चुकी है। यह सिर्फ़ स्वास्थ्य का अंतर नहीं यह नैतिक असमानता है, जो बताती है कि भारत में लोगों के जीवन की कीमत कितनी कम समझी जाती है।

भारत को तुरंत चाहिए:

1. अत्यधिक प्रदूषित शहरों में सिस्टेमैटिक लंग कैंसर स्क्रीनिंग

2. सही कैंसर रजिस्ट्री और जीन टेस्टिंग की राष्ट्रीय व्यवस्था

3. आधुनिक इलाज और दवाइयों पर आर्थिक सुरक्षा

4. वायु प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना

कॉल टू एक्शन

लंग कैंसर अवेयरनेस मंथ भारत में अनदेखा नहीं रहना चाहिए। सफेद रिबन गुलाबी रिबन की तरह हर जगह दिखने चाहिए। जागरूकता सिर्फ़ सोशल मीडिया पोस्ट नहीं बल्कि स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस, इलाज और सबसे महत्वपूर्ण प्रदूषण नियंत्रण में बदलनी चाहिए।

अगर दिल्ली की हवा एक स्वस्थ, युवा, नॉन-स्मोकर को स्टेज-4 कैंसर दे सकती है,
तो सवाल सिर्फ़ एक है:
अगर इससे भी हम जागेंगे नहीं, तो आखिर क्या हमें जगाएगा?

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