जीएसटी 2.0 : मोदी सरकार का बड़ा कर सुधार

पॉपकॉर्न टैक्स से लेकर जीएसटी 2.0 तक , मोदी सरकार की बड़ी कर सुधार योजना

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पूनम शर्मा
भारत में उपभोक्ताओं के लिए पॉपकॉर्न जितना स्वाद का विषय है, उतना ही यह टैक्स का भी। नमकीन ढीला पॉपकॉर्न 5% टैक्स में आता है, पैक्ड पॉपकॉर्न 12% और कैरामलाइज्ड पॉपकॉर्न 18% में। यही “तीन-स्तरीय पॉपकॉर्न टैक्स” लंबे समय से जीएसटी की जटिलता और असमानता का प्रतीक बन चुका है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी व्यवस्था को सरल बनाने और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए 50% टैरिफ जैसे वैश्विक दबावों का सामना करने के लिए एक बड़े कर सुधार की घोषणा की है। आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य मिलकर जीएसटी ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव मंजूर कर सकते हैं।

जीएसटी 2.0 : दो दरों की ओर

नई योजना के अनुसार मौजूदा चार टैक्स दरों (5%, 12%, 18% और 28%) को घटाकर दो मुख्य दरों में समेटा जाएगा। 12% और 28% वाले अधिकतर उत्पाद अब 5% और 18% की श्रेणी में आ जाएंगे। इसके अलावा तंबाकू, शराब और लग्ज़री कार जैसे “पाप उत्पादों” पर 40% की विशेष दर लागू होगी।
मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर कहा था – “सरकार अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार लाएगी, जिससे आम आदमी का कर बोझ कम होगा। यह आपके लिए दिवाली का तोहफा होगा।”

उपभोक्ताओं और कारोबार को राहत

बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपांवीता मजूमदार के अनुसार – “सबसे बड़ी राहत उपभोक्ताओं को चार-स्तरीय ढांचे से दो-स्तरीय ढांचे में जाने से मिलेगी।”
वस्त्रों से लेकर टू-व्हीलर और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं तक लगभग सभी पर कर कम होने की संभावना है। HSBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे मांग में तुरंत तेजी आ सकती है और दीर्घकाल में सरल कर व्यवस्था से जीडीपी वृद्धि क्षमता भी बढ़ सकती है।
हैदराबाद स्थित अमरा राजा एनर्जी एंड मोबिलिटी जैसी कंपनियों को भी राहत मिलेगी। अभी उनकी लेड-एसिड बैटरी पर 28% टैक्स लगता है, जो अब 18% पर आ जाएगा। कंपनी के सीएफओ डेल्ली बाबू वाई ने कहा – “दोनों तरह की बैटरियों पर समान टैक्स दर लगना हमारे लिए बड़ी राहत है।”

पुरानी पेचीदगियां और चुनौतियां

हालांकि जीएसटी जब आठ साल पहले लागू हुआ था, तब इसे मूल रूप से केवल दो दरों – 5% और 18% – में रखा जाना था। लेकिन बीच में 12% और 28% दरें जोड़ दी गईं। इससे कई अजीबोगरीब विवाद खड़े हुए – “क्या किटकैट चॉकलेट है या बिस्किट? नारियल का तेल खाना पकाने का तेल है या बालों का?”
इसके अलावा कंपनियों को अलग-अलग राज्यों में अलग जीएसटी नंबर लेना पड़ता है, कई बार भौतिक सत्यापन तक कराना पड़ता है। हर राज्य अलग से ऑडिट मांग सकता है, जिससे कारोबारी माहौल जटिल हो जाता है। जीएसटी विवाद निपटान के लिए ट्रिब्यूनल की स्थापना भी अभी पूरी तरह से शुरू नहीं हो सकी है।

राजस्व पर असर और राज्यों की चिंता

नई दरों से उपभोक्ता मांग तो बढ़ेगी, लेकिन सरकार का राजस्व लगभग 16 अरब डॉलर यानी जीडीपी का 0.4% कम हो सकता है। चूंकि जीएसटी से मिली आय केंद्र और राज्यों में बंटती है, इसलिए इसका असर राज्यों पर ज्यादा पड़ेगा।
केरल के वित्त मंत्री केएन बालगोपाल ने कहा – “हमारे खजाने को हर साल लगभग 1 अरब डॉलर का नुकसान होगा। इससे कल्याणकारी योजनाएं चलाना कठिन हो जाएगा।”

आगे की राह

मोदी सरकार का मानना है कि अमेरिका के टैरिफ से पैदा हुए आर्थिक दबाव को यह जीएसटी सुधार संतुलित कर देगा। सरल टैक्स संरचना से जहां कारोबार को राहत मिलेगी, वहीं उपभोक्ताओं के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा बचेगा। हालांकि, राज्यों की मुआवज़े की मांग और राजस्व में संभावित गिरावट सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी।

निष्कर्ष:
“तीन-स्तरीय पॉपकॉर्न टैक्स” से उपजी असमानताओं को खत्म करने की दिशा में जीएसटी 2.0 एक बड़ा कदम है। यह उपभोक्ता को राहत, कारोबार को सरलता और अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकता है। लेकिन इसका सफल कार्यान्वयन तभी संभव होगा जब केंद्र और राज्य आपसी तालमेल से राजस्व घाटे का समाधान ढूंढें।
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