समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 22 मई —सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर अहम सुनवाई हुई, जिसमें केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं के बीच तीखी बहस देखने को मिली। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने वक्फ को केवल दान न मानते हुए उसे “ईश्वर को समर्पण” बताया। उन्होंने कहा कि वक्फ का उद्देश्य आत्मिक लाभ और परलोक के लिए समर्पण है, न कि केवल सामाजिक कल्याण।
केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि एक दान की प्रक्रिया है, जिसे धर्म का अनिवार्य अंग नहीं माना जा सकता। इस पर चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “दान तो सभी धर्मों में होता है — हिंदुओं में मोक्ष की, ईसाइयों में स्वर्ग की आकांक्षा होती है।”
कपिल सिब्बल ने इस पर जोर दिया कि वक्फ एक बार कर दिया जाए तो वह हमेशा वक्फ ही रहता है, और इसकी वापसी संभव नहीं होती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब हिंदू धार्मिक ट्रस्टों में गैर-हिंदुओं को नहीं जोड़ा जाता, तो वक्फ बोर्ड में चार गैर-मुस्लिम सदस्यों की क्या आवश्यकता है।
सिब्बल ने सरकार को यह भी घेरा कि वक्फ संपत्ति के सर्वेक्षण और पंजीकरण की जिम्मेदारी राज्यों पर थी, जिसे कई राज्यों ने निभाया ही नहीं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पोर्टल पर किसी राज्य में वक्फ संपत्ति दर्ज नहीं है, तो क्या इसका मतलब यह है कि वहां वक्फ अस्तित्व में ही नहीं है?
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धार्मिक दान और संस्थाएं भारतीय संविधान में शामिल धार्मिक स्वतंत्रता के तहत आती हैं, लेकिन इसके कानूनी दायरे की समीक्षा आवश्यक है।
अब इस केस की अगली सुनवाई की प्रतीक्षा की जा रही है, जिसमें कोर्ट यह तय करेगा कि क्या वक्फ इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक अंग है या नहीं।