सामाजिक समरसता के प्रतिबिंब

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-बलबीर पुंज
सभी पाठकों को दीपावली की बधाई। क्या द्वापरयुग-त्रेतायुग संधिकाल के श्रीराम का जीवन कलियुग में प्रासंगिक है? वास्तव में, रामायण केवल आस्था का विषय नहीं, अपितु यह उन सब जीवनमूल्यों का समावेश है, जो व्यक्ति, समाज और विश्व को सुखी और संतुष्टमयी रहने का मार्ग दिखाता है। राम के जीवन यात्रा का विवेचनात्मक अध्ययन, बहुत से स्थापित मिथकों को ध्वस्त करते है।

आज वनवासियों को ‘वंचित’, ‘अक्षिक्षित’, ‘असभ्य’, तो वनों को ‘अविकसित’ के रूप में परिभाषित किया जाता है। राम के समय सभी नागरिक एक समान थे, कुछ वनवासी थे, तो शेष नगरवासी। वे शिक्षा ग्रहण करने वन स्थित ऋषि-मुनियों के आश्रम गए। जिन महान तपस्वियों, साधु-संतों ने श्रुति-स्मृति का निर्माण किया, वे सभी वनवासी थे— अर्थात्, सनातन भारत में वन ज्ञान, तपस्या और अध्यात्म का केंद्र थे।

एक मनुष्य को प्रत्येक स्थिति में कैसा आचरण करना चाहिए, उसके लिए श्रीराम आदर्श है। पिनाक (शिवधनुष) का टूटना, श्रीराम के जीवन की एक अद्वितीय घटना है। उनके लिए यह उत्सव और सफलता का क्षण है। लक्ष्मण के व्यंगों से महान शिवभक्त परशुरामजी क्रोधित हो उठे। दोनों ओर उत्तेजना चरम है और भीषण टकराव की संभावना है। तब राम सफलता के उत्कृष्ट छन में अपने विन्रम व्यवहार और मधुर-वाणी से स्थिति को संभालते है और क्रोधित परशुरामजी शांत होकर हिमालय चले जाते है। सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी एक व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिए, उसमें श्रीराम अनुकरणीय है।

श्रीराम सामाजिक समरसता के प्रतिबिंब है। अपने जीवन के सबसे कष्टमयी कालखंड में श्रीराम ने सहयोगी और सलाहकार वनवासियों को ही बनाया, जिसमें केवट निषाद, कोल, भील, किरात और भालू सम्मलित रहे। यदि श्रीराम चाहते तो, अयोध्या या जनकपुर से सहायता ले सकते थे। परंतु उनके साथी वे जन बने, जिन्हें आज आदिवासी, दलित, पिछड़ा या अति-पिछड़ा कहा जाता है। इन सभी को श्रीराम ने ‘सखा’ कहकर संबोधित किया, तो वनवासी हनुमान को लक्ष्मण से अधिक प्रिय बताया। “सुनु कपि जिय मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥”

भील समुदाय की शबरी माता का पिछड़ापन दोहरा है, क्योंकि वे गैर-अभिजात वर्ग की स्त्री है। श्रीराम शबरी के झूठे बेर सप्रेम ग्रहण करते है। राम को देखकर शबरी कहती हैं, “अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। इसपर रघुनाथ कहते हैं- कह रघुपति सुनू भामिनी बाता। मानाउँ एक भागति कर नाता।। जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धनबल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोइह कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।” अर्थात्- मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूं। जाति, पांति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल। मां सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले मांसाहारी गिद्धराज जटायु, जोकि वर्तमान में एक निकृष्ट पक्षी है— उसे श्रीराम कर्मों से देखते है और एक पितातुल्य बोध के साथ उसका अंतिम-संस्कार करते है। यह सूचक है कि श्रीराम के लिए केवल कर्म ही महत्व रखता है, शेष निरर्थक।

रावण कौन था? वह पुलस्त्य कुल में जन्मा ब्राह्मण, प्रकांड पंडित, महाप्रतापी, महान शिवभक्त, स्वर्ण लंका का सर्वशक्तिशाली स्वामी था। परंतु वह आचरण से दुराचारी, कामुक और भ्रष्ट था। इसलिए हनुमानजी ने अधर्म के प्रतीक लंका का दहन, तो श्रीराम ने रावण का वध किया। इस घटना से रेखांकित होता है कि आध्यात्मिक मूल्यों और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा हेतु सभ्य समाज को पद-कद-वर्ग आदि की चिंता किए बिना इन जीवनमूल्यों के शत्रुओं को दंडित करना चाहिए। यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस मूल्य को पुनर्स्थापित किया जाए, तो हम स्वस्थ समाज की रचना कर सकते है।

बालि संहार के पश्चात श्रीराम, सुग्रीव को किष्किन्धा का राजपाट सौंपते है, तो बालिपुत्र अंगद को इसका उत्तराधिकारी घोषित करते है। जब लंका में श्रीराम विजयी होते है, तब वे न केवल लक्ष्मण से कहकर विभिषण का राजतिलक करवाते है, अपितु विभिषण से घर की सभी महिलाओं को सांत्वना देने का अनुरोध भी करते है। राम शक्तिशाली और धर्मानुरागी होने के कारण समाज के अपराधी को तो दंडित करते है, किंतु पराजितों के धन-संपदा राज्य आदि से मोह नहीं रखते। यदि युद्धभूमि में इन मूल्यों का पालन किया जाता, तो विश्व का भूगोल और इतिहास कुछ और होता।

एक शत्रु के प्रति हमारा रवैया कैसा होना चाहिए? जब विभिषण अपने भाई रावण के किए पर लज्जित होकर उसके शव का अंतिम संस्कार करने में संकोच करते है, तब श्रीराम कहते है, “मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं न: प्रयोजनम्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।।” अर्थात्- बैर जीवन कालतक ही रहता है। मरने के बाद उस बैर का अंत हो जाता है। सोचिए, शेष विश्व ने युद्ध में मानवता और मर्यादा की रक्षा 115 वर्ष पहले ‘हेग कंवेन्शन’ के रूप में की थी, जिसकी अवहेलना होती रहती है। किंतु सनातन भारत में यह मूल्य हजारों वर्षों से विद्यमान है।

श्रीराम सदैव मर्यादा की परिधि में रहे, इसलिए वे मर्यादापुरुषोत्तम कहलाए। राजधर्म की कीमत होती है, जिसे राम ने चुकाया। जब वे अयोध्या नरेश बने, तब उनके लिए प्रजा सर्वोपरि और शेष निज-संबंध गौण हो गए। एक धोबी, जो वर्तमान नैरेटिव में दलित है— उसके कहने पर अपनी प्रिय सीता का त्याग कर दिया। महर्षि वाल्मिकी प्रणीत रामाणय में श्रीराम कहते हैं, प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रय:। उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम्।। अर्थात्- तीनों लोकों के प्राणियों को विश्वास दिलाने हेतु एकमात्र सत्य का सहारा लेकर मैंने अग्नि में प्रवेश करती विदेह कुमारी सीता को रोकने की चेष्ट नहीं की।

भारतीय वांग्मयों की मार्क्स-मैकॉले मानसपुत्रों ने अपने कुटिल एजेंडे के अनुरूप विवेचना की है। उनका उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों को मिटाना नहीं, अपितु उनका उपयोग करके ‘असंतोष’ का निर्माण करना है। जहां अन्याय नहीं होता, वहां वे झूठे नैरेटिव के बल पर ‘असंतोष’ को गढ़ते है। ऐसे ही कई मिथकों से वर्ग-संघर्ष अर्थात् हिंसा को जन्म दिया जाता है। रामायण, महाभारत इत्यादि के साथ भी वामपंथियों ने यही किया है। राम का जन्म किसी दलित की हत्या करने हेतु नहीं हुआ। उनका अवतरण रावण के रूप अन्याय, अनाचार और अभिमान को समाप्त करने हेतु था। राम अपने जीवनकाल में मर्यादापुरुषोत्तम कहलाए, तो उनके द्वारा प्रदत्त मूल्य वर्तमान में आज भी प्रासंगिक है। श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श— व्यक्ति, समाज और विश्व को अधिक सहज और सुखमय बनाने का भाव रखते है।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।

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