पूनम शर्मा
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या की खबरों के बीच Sonia Gandhi के एक लेख ने देश की राजनीति में तीखी बहस छेड़ दी है। भाजपा नेता प्रकाश रेड्डी ने उनके बयान को “हास्यास्पद” बताया और कांग्रेस पर परोक्ष रूप से आतंकवाद समर्थक रुख अपनाने का आरोप लगाया।
सरकार की “चुप्पी” पर सवाल
अपने लेख में सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की लक्षित हत्या पर भारत सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया न आने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के लिए गंभीर चुनौती है।
उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया Israel यात्रा और वहां प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के प्रति व्यक्त समर्थन के समय को भी संदर्भित किया और इसे “नैतिक स्पष्टता” के संदर्भ में सवालों के घेरे में रखा।
भाजपा का पलटवार
भाजपा नेता प्रकाश रेड्डी ने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति स्पष्ट है और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है। उनके अनुसार, भारत सभी देशों से मित्रतापूर्ण संबंध रखता है, लेकिन निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
रेड्डी ने यह भी याद दिलाया कि अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इजरायली नागरिकों पर हमले के समय कांग्रेस का रुख उतना स्पष्ट नहीं था। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि क्या वह उस हमले की स्पष्ट निंदा करती है।
विदेश नीति पर वैचारिक टकराव
यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति की दिशा पर वैचारिक मतभेद को दर्शाता है। एक ओर कांग्रेस पारंपरिक गुटनिरपेक्ष और अंतरराष्ट्रीय कानून आधारित दृष्टिकोण की बात कर रही है, तो दूसरी ओर भाजपा व्यावहारिक और हित-आधारित कूटनीति को प्राथमिकता दे रही है।
भारत के लिए स्थिति जटिल है। इजरायल के साथ रक्षा सहयोग महत्वपूर्ण है, वहीं ईरान ऊर्जा और सामरिक दृष्टि से अहम साझेदार है। खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय आबादी भी रहती है। ऐसे में संतुलित रुख अपनाना कूटनीतिक आवश्यकता बन जाता है।
आगे क्या?
कांग्रेस ने बजट सत्र में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की है। आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
पश्चिम एशिया संकट ने एक बार फिर यह दिखाया है कि वैश्विक राजनीति का असर घरेलू राजनीति पर भी गहरा पड़ता है। अब देखना यह होगा कि भारत अपनी कूटनीतिक संतुलन नीति को कैसे आगे बढ़ाता है और राजनीतिक दल इसे किस तरह से चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।