ट्रंप टैरिफ पर भारत की जवाबी रणनीति
GTRI के अनुसार निर्यात संवर्धन मिशन की रूपरेखा मजबूत जरूर है, लेकिन सीमित फंडिंग, धीमी क्रियान्वयन गति और संगठनात्मक चुनौतियाँ इसके असर को घटा सकती हैं।
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केंद्र सरकार ने 6 वर्षों में ₹25,060 करोड़ से निर्यात क्षमताएँ बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
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ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर 50% टैरिफ लगाए जाने के बीच यह मिशन बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।
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डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और स्कीम गाइडलाइन्स तैयार न होने से लाभार्थियों तक सहायता पहुँचना देर से होगा।
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फंडिंग, विशेषज्ञता और DGFT की संचालन क्षमता को लेकर GTRI ने गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत किया है।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 13 नवम्बर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के कई उत्पादों पर 50% टैरिफ लगाने के बाद केंद्र सरकार ने वैश्विक व्यापार दबाव को कम करने के उद्देश्य से निर्यात संवर्धन मिशन (Export Promotion Mission – EPM) को मंजूरी दी है।
हालाँकि ग्लोबल ट्रेड एंड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि यह मिशन अभी केवल एक व्यापक अवधारणा के रूप में मौजूद है और इसे प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, पर्याप्त बजट और तेज़ क्रियान्वयन की ज़रूरत होगी।
मिशन की रूपरेखा
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने FY 2025-26 से FY 2030-31 तक के लिए ₹25,060 करोड़ की राशि स्वीकृत की है। लक्ष्य है—देश की निर्यात प्रतिस्पर्धा को एकीकृत ढांचे के माध्यम से मजबूत करना।
मिशन के दो प्रमुख घटक हैं:
1. निर्यात प्रोत्साहन
MSMEs की व्यापार वित्त लागत कम करने पर केंद्रित
ब्याज सहायता, एक्सपोर्ट फैक्टरिंग, गारंटी, क्रेडिट एन्हांसमेंट, ई-कॉमर्स निर्यात क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाएँ
वैश्विक टैरिफ वृद्धि से प्रभावित सेक्टरों को प्राथमिकता:
- टेक्सटाइल
- लेदर
- जेम्स ऐंड ज्वेलरी
- इंजीनियरिंग गुड्स
- मरीन उत्पाद
2 निर्यात दिशा
ब्रांडिंग, पैकेजिंग, गुणवत्ता सुधार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले, लॉजिस्टिक सपोर्ट और निर्यात वेयरहाउसिंग जैसी नॉन-फाइनेंशियल सहायता
Interest Equalisation Scheme (IES) और Market Access Initiative (MAI) को भी इसमें शामिल किया गया है।
मिशन की चुनौतियाँ
GTRI ने रिपोर्ट में कहा है कि मिशन की सफलता पर कई प्रमुख बाधाएँ असर डाल सकती हैं:
1. गाइडलाइन्स अभी जारी नहीं
फरवरी में घोषणा के बावजूद पात्रता, संचालन और भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी विस्तृत स्कीम गाइडलाइन्स तैयार नहीं हैं।
2. डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म में देरी
EPM के लिए जरूरी पोर्टल अभी विकास चरण में है।
इससे MSMEs और अन्य निर्यातकों को लाभ मिलने में कई महीनों की देरी संभव है।
3. फंडिंग सीमित
6 साल में ₹25,060 करोड़ यानी प्रति वर्ष करीब ₹4,200 करोड़।
अकेली Interest Equalisation Scheme ने पिछले वर्ष ₹3,500 करोड़ उपयोग किए।
ऐसे में ब्रांडिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, मेले और अनुपालन सहायता के लिए बहुत कम बजट बचेगा।
4. संस्थागत चुनौतियाँ
DGFT को वित्तीय कार्यक्रमों को सीधे लागू करना होगा, जबकि पहले यह कार्य RBI निगरानी वाले बैंकों के सहयोग से किया जाता था।
- इससे प्रोसेसिंग धीमी हो सकती है
- फाइलें अटक सकती हैं
- निपटान में देरी हो सकती है
GTRI का कहना है कि मिशन तभी प्रभावी साबित होगा जब सरकार तेज़ क्रियान्वयन, विभागीय तालमेल, और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन सुनिश्चित करे।