न बिजली, न मोबाइल, फिर भी जंगल नहीं छोड़ा: तेलंगाना की पहाड़ी पर अनोखा जीवन

विकास से दूर, पर अपने फैसले पर अडिग: पहाड़ी पर बसता एक अलग संसार

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समग्र समाचार सेवा
भद्राद्री कोठागुडेम (तेलंगाना), 16 जनवरी: तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम ज़िले में एक ऊँची पहाड़ी पर, घने जंगलों के बीच बीते ढाई दशक से एक आदिवासी परिवार बाहरी दुनिया से लगभग कटा हुआ जीवन जी रहा है। न बिजली, न मोबाइल नेटवर्क और न ही पक्की सड़क—फिर भी यह परिवार अपने जंगल को छोड़ने को तैयार नहीं।

तीन लोग, एक पहाड़ी और पूरा जंगल

अश्वरावुपेटा मंडल के कंथलम वन क्षेत्र में बसे इस परिवार में पति-पत्नी और उनका बेटा शामिल है। इंसानी बसावट तक पहुँचने के लिए इन्हें करीब तीन किलोमीटर पैदल उतरना पड़ता है। आधुनिक सुविधाएँ यहाँ तक नहीं पहुँचतीं, लेकिन परिवार का कहना है कि उन्हें इसकी ज़रूरत भी नहीं।

कभी था पूरा गाँव

आज जहाँ सन्नाटा है, कभी वहीं गोगुलापुडी नाम का छोटा सा आदिवासी गाँव था। पहाड़ी पर करीब 40 परिवार रहते थे। 1990 के दशक से प्रशासन ने इन्हें नीचे बसाने की कोशिश शुरू की—तर्क था कि इतनी दुर्गम जगह पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी सुविधाएँ देना संभव नहीं।

साल 2000 में ज़्यादातर परिवार पहाड़ी की तलहटी में बनी पुनर्वास कॉलोनी में आ गए। मगर एक परिवार गुरुगुंटला रेड्डैया का वहीं जंगल में रह गया।

जहाँ पति, वहीं मेरा घर

रेड्डैया की पत्नी लक्ष्मी साफ़ कहती हैं कि उनके पति जहाँ रहेंगे, वह वहीं रहेंगी। बेटा गंगिरेड्डी भी माता-पिता के साथ ही रहने पर अड़ा है। परिवार का मानना है कि जंगल ही उनका असली घर है—यहीं जन्म हुआ, यहीं जीवन बीतेगा।

बिना बिजली भी आसान जीवन

दिन में सूरज, रात में चाँद-तारे यही उनका समय मापने का तरीका है। अंधेरा होते ही अलाव जलता है, जो सुबह तक सुलगता रहता है। डर के सवाल पर जवाब सीधा है आदत हो गई है।

खेतों में चावल, ज्वार, बाजरा और मौसमी सब्ज़ियाँ उगाई जाती हैं। पास की नदी साल भर पानी देती है। अनाज सिर्फ़ ज़रूरत भर ही पैदा किया जाता है।

बीमारी और इलाज का अपना तरीका

परिवार आधुनिक इलाज से दूर है। हल्की-फुल्की तबीयत बिगड़ने पर जंगल की जड़ी-बूटियों और पत्तों पर भरोसा किया जाता है। लक्ष्मी की नज़र अब कमजोर हो गई है, वह लाठी के सहारे चलती हैं लेकिन इसे भी वह जीवन का सामान्य हिस्सा मानती हैं।

पाँच झोपड़ियाँ, अपना नियम

तीन लोगों के लिए अलग-अलग झोपड़ी, एक मुर्गियों-कुत्ते के लिए और एक लकड़ी-जलावन के लिए कुल पाँच झोपड़ियाँ। बारिश में टपकन से बचने के लिए मंदिरों के पास त्योहारों में लगे पुराने बैनर छत पर डाल दिए जाते हैं।

पढ़ाई-शादी से दूरी

बेटा गंगिरेड्डी न स्कूल गया, न उसकी शादी हुई। उसका कहना है “अगर लड़की पहाड़ी पर रहने को तैयार हो, तभी शादी।” नीचे उतरकर बसने का सवाल ही नहीं।

पहचान पत्र भी नहीं चाहिए

प्रशासन ने आधार और राशन कार्ड बनवाने की कोशिश की, लेकिन पिता और बेटे ने मना कर दिया क्योंकि इसके लिए नीचे जाना पड़ता। लक्ष्मी कभी-कभार बेटी से मिलने नीचे जाती हैं, इसलिए उनके पास ये दस्तावेज़ हैं और ज़रूरत पड़ने पर वह राशन भी ले आती हैं।

डर और दूरी

हाल के दिनों में प्रशासन और मीडिया की आवाजाही बढ़ी है। लक्ष्मी बताती हैं कि पति को डर सताने लगा है कि कहीं उन्हें ज़बरन नीचे न ले जाया जाए। इसी डर से वह दिन में जंगल में छिपे रहते हैं और शाम ढलने पर ही घर लौटते हैं।

गाँव वालों की राय

नीचे बसे गोगुलपुडी के युवाओं का मानना है कि जबरदस्ती बसाने से रेड्डैया का परिवार खुश नहीं रहेगा। उनकी मांग है कि वहीं सोलर लाइट, टीन की छत और सुरक्षा के लिए बाड़ जैसी बुनियादी सुविधाएँ दे दी जाएँ।

प्रशासन की मजबूरी

स्थानीय अधिकारी कहते हैं कि परिवार की इच्छा के बिना उन्हें जंगल से हटाया नहीं जा सकता। कोशिशें जारी हैं, लेकिन फिलहाल यह परिवार अपने फैसले पर अडिग है।

जंगल ही उनकी दुनिया

ढाई दशक बीत चुके हैं, पर यह परिवार अब भी उसी पहाड़ी पर है जहाँ जंगल ही घर है, अलाव ही रोशनी है और सादगी ही जीवन का नियम। आधुनिक दुनिया के बीच यह कहानी बताती है कि विकास का मतलब हर किसी के लिए एक-सा नहीं होता।

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