सुशासन और सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक हैं अहिल्याबाई होलकर: डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय

भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व और सुशासन की प्रेरक मिसाल बनी अहिल्याबाई होलकर

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली। 13 जनवरी: अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय ने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई होलकर भारतीय इतिहास में सुशासन, न्याय और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई होलकर का जीवन आज के प्रशासन और समाज के लिए प्रेरणास्रोत है तथा उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।

विश्व पुस्तक मेला में पुस्तक लोकार्पण का अवसर

 

डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय यह विचार विश्व पुस्तक मेला के अवसर पर भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में व्यक्त कर रहे थे। सोमवार, 12 जनवरी 2026 को हॉल नंबर-5, C-02 में संपन्न इस कार्यक्रम में ‘लोकमाता अहिल्याबाई होलकर’ पुस्तक का विमोचन किया गया। पुस्तक का लेखन  इतिहासकार अजय कुमार सिंह द्वारा किया गया है।

मुख्य अतिथि और विशिष्ट वक्ताओं के विचार

मुख्य अतिथि प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी (निदेशक, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला) ने कहा कि अहिल्याबाई होलकर का शासन भारतीय राजनीतिक परंपरा में नैतिकता और लोककल्याण का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पुस्तक शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।


सारस्वत अतिथि प्रो. एस.पी. बसंल (कुलपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला) ने कहा कि यह कृति भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व की भूमिका को सुदृढ़ अकादमिक आधार प्रदान करती है।

विशिष्ट अतिथि महेंद्र कुमार (वरिष्ठ उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ) ने पुस्तक को राष्ट्रबोध और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने वाला ग्रंथ बताया।

कार्यक्रम का संचालन प्रो. राकेश मंजुल ने किया। अतिथियों का सम्मान प्रशांत जैन (प्रबंधक, किताबवाले) द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रो. रमेश मिश्र, डॉ. शब्द प्रकाश, डॉ. अजय कुमार सहित अनेक शिक्षाविद् एवं शोधकर्ता उपस्थित रहे।

पुस्तक का सारांश: अहिल्याबाई होलकर का युग और योगदान

‘लोकमाता अहिल्याबाई होलकर’ पुस्तक 18वीं शताब्दी की महान शासिका अहिल्याबाई होलकर के प्रशासनिक, सामाजिक और धार्मिक योगदान को विस्तार से प्रस्तुत करती है। मालवा की होलकर रानी के रूप में उन्होंने न्यायपूर्ण, उदार और लोकहितकारी शासन की मिसाल कायम की।

उन्होंने महेश्वर को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया और काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, पुरी तथा द्वारका जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों के पुनरुद्धार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। मंदिरों, धर्मशालाओं, कुओं और अन्नदान संस्थानों के माध्यम से उन्होंने जनसेवा को शासन की आधारशिला बनाया। यह पुस्तक उनकी 300वीं जन्म शताब्दी पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध पत्रों का संकलन है।

लेखक परिचय: इतिहास शोध के समर्पित अध्येता

पुस्तक के लेखक अजय कुमार सिंह एम.ए., पीएचडी हैं और दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास में विशेषज्ञता रखते हैं। वे भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली से पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो तथा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से वरिष्ठ अध्येयता रह चुके हैं।

 

डॉ. सिंह 55 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलनों में सहभागिता कर चुके हैं और उनके 50 से अधिक शोधपत्र प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वे इतिहास दर्पण, इंडियन जर्नल ऑफ हिस्टॉरिकल स्टडीज, राइटर्स व्यू और शोध सीमांकन जैसी पत्रिकाओं के संपादक भी हैं। वर्तमान में वे श्रद्धानन्द कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक एवं दीनदयाल उपाध्याय अध्ययन केंद्र के समन्वयक हैं।

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