पूनम शर्मा
हाल के वर्षों में भारत में यह बहस तेज़ हुई है कि क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में “राष्ट्रविरोधी” विचार पनप रहे हैं। टीवी डिबेट, सोशल मीडिया, राजनीतिक भाषणों और अख़बारों में बार-बार यह सवाल उठता है कि उच्च शिक्षा संस्थान देशभक्ति के बजाय असंतोष और विरोध की प्रयोगशालाएँ बनते जा रहे हैं। बहुत कम शिक्षा प्रतिष्ठान ऐसे हैं जहाँ राष्ट्र प्रेम एक भावनात्मक रूप मे विकसित हो रहा है । इसका कारण यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में जो सामाजिक विज्ञान एवं इतिहास की शिक्षा अंतर्भुक्त की गई वह भारत की मूल संस्कृति के विरोध में थी । इस बात का प्रमाण उस समय की शिक्षा प्रणाली के संयोजन और शिक्षण सामग्री जो विकसित एवं प्रसारित की गई उससे मिलता है जिसमें भारत के सच्चे स्वरूप के अध्ययन का कहीं उल्लेख नहीं । भारत के लोगों को बौद्धिक रूप से आत्मनिर्भरता की ओर इस शिक्षा प्रणाली का ले जाने का कोई इरादा नहीं था ।
कॉनवेंट स्कूलों के प्रचलन से पाश्चात्य संस्कृति एवं मानसिकता दोनों का प्रमुख रूप से प्रसारण हुआ जिसके कारण भारतीयता धीमी पड़ी । औपनिवेशिक मानसिकता इस कारण समाज को ग्रसित करती गई । भारतीय मूल्य एवं सामाजिक आधार हटते गए । एक आर्थिक रूप से कमजोर देश व समाज पश्चिम के प्रलोभनों में फँसता चला गया आर्थिक रूप से उन्नत देशों में जाकर बसने का स्वप्न साकार करना ही जैसे उद्देश्य बन गया ।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि “राष्ट्रविरोधी” का अर्थ क्या है। क्या सरकार की आलोचना करना राष्ट्रविरोध है? ऐतिहासिक घटनाओं या नीतियों पर सवाल उठाना देशद्रोह कहलाएगा? नहीं । लोकतंत्र में राष्ट्र और सरकार एक समान नहीं होते। संविधान स्वयं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, बशर्ते वह हिंसा, नफ़रत या देश की संप्रभुता को नुकसान न पहुँचाए। इस बुनियादी भेद को समझे बिना स्कूलों और कॉलेजों में हो रही बहसों का मूल्यांकन अधूरा रहेगा।
जब भी इस विषय की चर्चा होती है, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का उदाहरण सबसे पहले सामने आता है। 2016 में कुछ छात्रों पर “राष्ट्रविरोधी नारे” लगे, जिसके बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। ऐसे नारे यह दिखाते हैं कि विश्वविद्यालयों में देशविरोधी मानसिकता को बढ़ावा मिल रहा है।मुद्दों को सरल निष्कर्षों में बदल दिया जाता है। और ऐसा बार बार कई शिक्षा स्थानों पर होते हुए देखा गया ।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे संस्थानों को भी कई बार ऐसा देखा गया है। कभी तिरंगे को लेकर , तो कभी किसी छात्र संगठन की देश विरोधी गतिविधि। अब भी कुछ कैंपसों में अलगाववादी या कट्टर विचारधाराएँ जगह बना रही हैं। लेकिन तथ्य यह भी है कि इन्हीं संस्थानों से निकले हज़ारों छात्र प्रशासन, सेना, विज्ञान, शिक्षा और उद्योग में नौकरी भी कर रहे हैं।
स्कूल स्तर पर देखें तो स्थिति कुछ अलग है। स्कूलों में खुलकर “राष्ट्रविरोधी” विचारधारा के उदाहरण कम ही मिलते हैं पर इस बात की शुरुआत अवश्य हो जाती है । क्योंकि अधिकतर पाठ्यक्रम (सिलेबस) जैसे इतिहास की किताबों में मुग़ल काल का ज़िक्र कितना हो, स्वतंत्रता संग्राम के किस नायक को कितना महत्व मिले, या समकालीन राजनीतिक मुद्दों को कैसे प्रस्तुत किया जाए। इसका एक विशेष कारण इतिहास को “तोड़-मरोड़” कर पढ़ाया जाना रहा है, जिससे छात्रों में राष्ट्र के प्रति गर्व कम होता है। वहीं कुछ वामपंथी शिक्षाविदों का कहना है कि इतिहास का उद्देश्य महिमामंडन नहीं, बल्कि तथ्यात्मक और आलोचनात्मक समझ विकसित करना है। छात्रों में राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना का विकास कैसे होगा यदि अपने गौरवशाली अतीत को नहीं जानेगे ?
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि कॉलेजों में विरोध प्रदर्शन और नारेबाज़ी क्यों बढ़ी है। इसका एक कारण यह है कि विश्वविद्यालय युवाओं के विचार-निर्माण का केंद्र होते हैं। कुछ लोगों का कहना है बेरोज़गारी, महंगाई, सामाजिक असमानता, जाति और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दे छात्रों को सीधे प्रभावित करते हैं। जब वे इन पर सवाल उठाते हैं या विरोध करते हैं, तो उसे तुरंत राष्ट्रविरोधी करार देना समस्या को समझने के बजाय उसे दबाने का प्रयास लगता है।
परंतु अपने देश की महत्वपूर्ण उपलब्धियों पर उसका यशोगान क्या यह संभव नहीं ? अपने राष्ट्र के गौरव पर विचार करना यह कर्तव्य नहीं ?
उदाहरण के तौर पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ़ 2019-20 में कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन हुए। इसका विरोध भी छात्रों द्वारा किया गया । विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है परंतु राष्ट्र हित नीतियों का विरोध तो अपने आप में राष्ट्रविरोध है।
हालाँकि, भारत की शैक्षणिक संस्थानों में समस्या है। कुछ मामलों में वाम या दक्षिणपंथी अतिवादी विचारधाराएँ अकादमिक बहस की जगह नारेबाज़ी और बहिष्कार का रूप ले लेती हैं। जब विचारों की विविधता के बजाय एक ही वैचारिक लाइन थोपी जाती है, तो शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ता है। यदि कोई शिक्षक या छात्र खुले तौर पर हिंसक या अलगाववादी विचारों का समर्थन करता है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निष्कर्षतः, यह कहना कि भारत के सभी स्कूलों और कॉलेजों में व्यापक रूप से राष्ट्रविरोधी पैदा हो रहे हैं, गलत होगा। हाँ, कुछ संस्थानों और कुछ व्यक्तियों के स्तर पर समस्याएँ हैं, जिन पर गंभीर और निष्पक्ष चर्चा ज़रूरी है। लेकिन आलोचनात्मक सोच, असहमति और बहस को राष्ट्रविरोध से जोड़ देना न तो शिक्षा के हित में है और न ही लोकतंत्र के। आवश्यकता इस बात की है कि शैक्षणिक संस्थान ऐसे स्थान बनें जहाँ देश के प्रति प्रतिबद्धता हो शिक्षा प्राप्त करना उद्देश्य बाहर के देशों से फंड लेकर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में भाग लेना न हो। जैसा की लाल किले के बम ब्लास्ट में डाक्टरों के समूह तथा इससे पूर्व शरजील इमाम के मामले में देखा गया ।