पूनम शर्मा
भारत की प्राचीन परंपरा में गुरुओं की भूमिका सदैव मार्गदर्शक की रही है। उन्होंने समाज को जोड़ने, चेतना जगाने और सद्भाव स्थापित करने का कार्य किया है। इसलिए जब कोई प्रतिष्ठित धार्मिक गुरु सार्वजनिक मंच से बोलता है, तो उनके शब्द केवल व्यक्तिगत मत नहीं होते , बल्कि समाज की दिश और चेतना को जागृत करने का काम करते हैं । एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में समाज के प्रति उनकी नैतिक जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। गुरु का दायित्व केवल उपदेश देना ही नहीं, बल्कि समाज को संयम, विवेक और संतुलन का मार्ग दिखाना भी होता है। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे अपने शब्दों के प्रभाव और सामाजिक परिणामों को भली-भांति समझते हों।
1. क्रिकेट और राष्ट्रवाद: खेल से आगे की बहस
जनवरी 2026 में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उस समय तीखी प्रतिक्रिया दी जब बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) ने बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्ताफिज़ुर रहमान को आईपीएल में शामिल किया। उन्होंने इसे केवल एक खेल निर्णय न मानकर राष्ट्रीय और धार्मिक संदर्भ से जोड़ दिया। इसका कारण बहुत स्पष्ट है ।
भारत के विरोध में की गई किसी भी गतिविधि के विरोध में आज तक उनका कोई बयान या टिप्पणी सामने नहीं आई है। अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला है जिससे उनकी राष्ट्रीय निष्ठा की भावना का प्रदर्शन हो । ऐसे में उनके सार्वजनिक आचरण को लेकर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है , बल्कि गद्गुरु रामभद्राचार्य का वक्तव्य और कार्य उनके राष्ट्रप्रेम पर सही प्रश्न करते हैं।
शाहरुख़ ख़ान को “देशद्रोही” कहने वाला बयान अत्यंत महत्वपूर्ण है । जगद्गुरु रामभद्राचार्य का तर्क था कि जिस देश (बांग्लादेश) में हिंदुओं पर अत्याचार की खबरें आती रहती हैं, वहाँ के खिलाड़ियों को भारतीय मंच और आर्थिक समर्थन नहीं देना चाहिए । उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश—दोनों देशों के साथ खेल संबंधों के पूर्ण बहिष्कार की भी माँग की। इस बात का यह पूर्णतया आधार है कि आज तक भारत विरोधी कोई भी गतिविधि जब जब हुई है शाहरुख जैसी हस्ती का कोई टिप्पणी या संवेदना कहीं भी नजर नहीं आती ।
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या खेल को राष्ट्रवाद से अलग रखा जाना चाहिए ? आईपीएल एक व्यावसायिक और वैश्विक लीग है, जिसमें खिलाड़ी को राष्ट्रीयता से अलग नहीं कौशल के आधार पर चुने जाते हैं परंतु कुशल खिलाड़ी यदि राष्ट्रप्रेमी नहीं है तो क्या उसे यह दायित्व देना चाहिए ? रामभद्राचार्य का दृष्टिकोण भावनात्मक और राष्ट्रवादी है, जबकि खेल जगत का ढांचा व्यावसायिक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित है तो क्या व्यवसाय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग राष्ट्रप्रेम से भी ऊपर है ?
2. “मिनी पाकिस्तान” टिप्पणी
सितंबर 2025 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को “मिनी पाकिस्तान” कहने वाला बयान और भी गंभीर प्रभाव वाला था। मेरठ, संभल और मुजफ्फरनगर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस तरह संबोधित करना भी एक केवल राजनीतिक चेतना जगाने वाला था, इस बयान का विरोध करने वाले इसे सौहार्द के लिए भी चुनौतीपूर्ण माँ रहे थे ।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा था कि इन क्षेत्रों में हिंदू आबादी असुरक्षित महसूस कर रही है और विस्थापन का सामना कर रही है जो कि अक्षरशः सत्य है । हालांकि, इस बयान को समाजवादी पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों ने भड़काऊ और विभाजनकारी बताया। आलोचकों का कहना था कि ऐसे शब्द जमीनी सच्चाई को सरल करके सामुदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाते हैं।
यह समझना जरूरी है कि सुरक्षा और अल्पसंख्यक/बहुसंख्यक अधिकारों पर चर्चा आवश्यक है, लेकिन जब यह चर्चा सांकेतिक और तुलनात्मक भाषा में होती है, तो वह सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है।
3. PoK पर बयान: आध्यात्मिक गुरु से रणनीतिक टिप्पणी तक
मई 2025 में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी से मुलाकात के दौरान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को “गुरुदक्षिणा” के रूप में माँगना और पाकिस्तान को “नक्शे से मिटा देने” जैसी टिप्पणी करना, एक आध्यात्मिक नेता की राष्ट्रीयता की भूमिका से प्रेरित था ।
यह बयान सीधे तौर पर सैन्य और विदेश नीति से जुड़ा हुआ था। यह प्रबल राष्ट्रवादी भावना का प्रतीक था , जबकि आलोचकों का मानना है कि इस तरह की भाषा कूटनीतिक जटिलताओं को नजरअंदाज करती है और युद्धोन्मुख माहौल को बढ़ावा देती है।
4. हिंदू अल्पसंख्यक मुद्दा:
जगद्गुरु रामभद्राचार्य के अधिकांश बयानों के मूल में एक साझा चिंता दिखाई देती है—पड़ोसी इस्लामिक देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति। यह एक वास्तविक और गंभीर विषय है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा होती रही है। परंतु सिर्फ चर्चा से कुछ नहीं होता । सवाल यह है कि क्या इस चिंता को व्यक्त करने का तरीका संवादात्मक होना चाहिए या अधिक क्रियाशील ?
खेल बहिष्कार, कलाकारों पर व्यक्तिगत आरोप, और पूरे क्षेत्रों या देशों को शत्रु की श्रेणी में रखना—ये सभी उपाय अल्पसंख्यकों की मदद एवं प्रेरित करने वाले बयान हैं जो राजनीतिज्ञों को प्रेरणा दे सकते हैं ।
निष्कर्ष
जगद्गुरु रामभद्राचार्य के बयान यह दिखाते हैं कि भारत में परंपरागत धार्मिक नेतृत्व और राष्ट्रवादी राजनीति के बीच की समानांतर रेखा लगातार प्रगति करती जा रही है। उनके वक्तव्यों में हिंदू हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता झलकती है, वहीं दूसरी ओर उनकी भाषा और तुलना राष्ट्रविरोधी तत्वों और विवाद का उजागर करती रहती है ।
आज के बहुलतावादी और वैश्विक भारत में हिंदुओं की असुरक्षा जो पश्चिम बंगाल ,कश्मीर ,बांग्लादेश ,पाकिस्तान जैसे देशों में देखी जा रही है अब यह आवश्यक है कि प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तित्व अपनी अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी को समझें। धर्म, राष्ट्र और खेल—तीनों अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब वे बिना असंतुलित होते हैं तो ऐसे महानुभावों के विचारों का प्रभाव अत्यंत आवश्यक होता है राष्ट्रप्रेम एवं राष्ट्र हित से बड़ा कोई खेल ,राजनीति नहीं हो सकती । शाहरुख खान ने भारत के किसी खिलाड़ी को प्राथमिकता न देते हुए आज के दुश्मन बने भारतविरोधी देश बांग्लादेश के एक खिलाड़ी को अपनी टीम में लिया यह खुले आम भारत का विरोध प्रदर्शन दर्शाता है ।