शक्ति, आस्था और समझौते की राजनीति: भारत एक निर्णायक मोड़ पर

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पूनम शर्मा
जब प्रतीक राजनीति बन जाते हैं

वैश्विक राजनीति में कोई भी प्रतीक तटस्थ नहीं होता। जब कोई प्रधानमंत्री चर्च जाता है या मोमबत्ती जलाता है, तो वह केवल एक धार्मिक संकेत नहीं रहता—वह अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक राजनीति में एक संदेश बन जाता है। भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में, ऐसे संकेत कई बार संतुलन स्थापित करने के बजाय असंतुलन पैदा कर देते हैं।

समस्या तब गहरी होती है जब बहुसंख्यक या स्वदेशी समुदायों की वास्तविक चिंताओं को “दुश्कृतिकारी” या उपद्रव कहकर खारिज कर दिया जाता है, जबकि संगठित वैचारिक विस्तार को नैतिकता की भाषा में ढक दिया जाता है।

नीति बनता समझौता

समझौता यदि रणनीति हो तो उपयोगी है, लेकिन जब वह नीति बन जाए तो राज्य की विश्वसनीयता कमजोर हो जाती है। मणिपुर में मीतई हिंदू समुदाय का भूमि से विस्थापन केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक संकोच का परिणाम भी है। एक हिंदू मुख्यमंत्री से इस्तीफा दिलवाया जाना इस बात का संकेत है कि दबाव अब संवैधानिक सीमाओं से ऊपर जाने लगे हैं। यह भारत के संघीय ढांचे की परीक्षा है।

पूर्वोत्तर का इतिहास और असुविधाजनक सत्य

पूर्वोत्तर भारत को अक्सर भावनात्मक नजर से देखा जाता है, ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं। ईसाई बहुलता का विस्तार औपनिवेशिक काल में प्रशासनिक समर्थन के साथ हुआ। सामाजिक सेवा धीरे-धीरे सांस्कृतिक व धार्मिक पुनर्रचना में बदल गई। रानी गाइडेलिन्यू जैसी हस्तियां, जिन्होंने इस सांस्कृतिक आक्रमण का विरोध किया, आज इतिहास के हाशिये पर हैं। उनकी कथा पढ़ना न किसी धर्म के खिलाफ है, न किसी समुदाय के—यह ऐतिहासिक ईमानदारी की मांग है।

वैश्विक चयनात्मक चुप्पी

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचारों के प्रमाण अनेक बार सामने आए हैं। फिर भी, किसी भी बड़े ईसाई या पश्चिमी देश ने ठोस निंदा नहीं की। यह नैतिक अज्ञान नहीं, बल्कि रणनीतिक गणना है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं चलती। वह शक्ति-संतुलन से चलती है। जो राष्ट्र स्वयं अपने नागरिकों और सभ्यता के लिए स्पष्ट नहीं होता, उसके लिए कोई जोखिम नहीं उठाता।

कल कौन बोलेगा?

यह प्रश्न असहज है, लेकिन आवश्यक है—यदि कल भारत में हिंदुओं पर बड़े पैमाने पर हिंसा होती है, तो कौन देश आवाज उठाएगा? इतिहास बताता है कि मौन अक्सर सोची-समझी नीति होती है। केवल नैतिक संयम वैश्विक समर्थन नहीं दिलाता। शक्ति के बिना नैतिकता अनसुनी रह जाती है।

शक्ति का अर्थ दमन नहीं

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच हमेशा सक्रिय रक्षा पर आधारित रही है। शक्ति का अर्थ अल्पसंख्यकों का दमन नहीं, बल्कि कानून का समान पालन, स्वदेशी समुदायों की रक्षा और वैचारिक स्पष्टता है। सभ्यताएँ स्वीकृति माँगकर  नहीं, संतुलन स्थापित करके जीवित रहती हैं। जब भारत आत्मविश्वास से बोलता है, दुनिया सुनती है। जब भारत झिझकता है, दुनिया उपदेश देती है।

कठोर लेकिन आवश्यक सत्य

वैश्विक सम्मान अच्छे इरादों से नहीं मिलता—वह संकल्प से अर्जित होता है। जो इस सत्य को भूल जाते हैं, वे इतिहास बनते हैं, इतिहास गढ़ते नहीं।

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