शोधार्थियों को समाज से सीधा संवाद करना होगा: भागवत
युवा शोधार्थी संवाद में संघ प्रमुख ने दिए राष्ट्रीय उत्थान के मूलमंत्र
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज के उत्थान के लिए शोधार्थियों और विश्वविद्यालयों का समाज से सीधा संवाद आवश्यक है।
- उन्होंने संघ के बारे में जानने के इच्छुक लोगों से विरोधी प्रचार को छोड़कर संघ के मूल साहित्य और प्रत्यक्ष शाखा को देखने का आह्वान किया।
- उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का कार्य केवल व्यक्ति निर्माण का है, जिससे समाज परिवर्तन और अंततः राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य साधा जाता है।
समग्र समाचार सेवा
जयपुर, 17 नवंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कल, रविवार (16 नवंबर) को जयपुर के मालवीय नगर स्थित पाथेय कण संस्थान के सभागार में आयोजित ‘युवा शोधार्थी संवाद – शाश्वत मूल्य, नए आयाम’ कार्यक्रम में युवा शोधार्थियों से महत्वपूर्ण चर्चा की।
उन्होंने शोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शोधार्थियों और विश्वविद्यालयों को यह समझना होगा कि किन विषयों से समाज को सीधा लाभ हो सकता है। कुछ विषय मात्र ज्ञान प्राप्ति के लिए होते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे विषय भी हैं जो समाज के उत्थान और उपयोग से सीधे जुड़े हुए हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों का समाज के साथ जुड़ाव मज़बूत और निरंतर होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि संवाद के माध्यम से ही शोध की दिशा तय की जानी चाहिए ताकि वह केवल अकादमिक न रहे, बल्कि राष्ट्र निर्माण में सहायक हो सके।
संघ को जानने के लिए मूल स्रोतों पर जाएं
कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों के कई प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ. भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बारे में फैली भ्रांतियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने स्वीकार किया कि संघ के हितैषी और विरोधी दोनों ही संघ के बारे में चर्चा करते हैं, लेकिन हितैषी प्रचार-प्रसार में पीछे हैं, जबकि विरोधी बहुत आगे हैं और उन्होंने झूठ का एक जाल बुन दिया है।
सरसंघचालक ने स्पष्ट आह्वान किया कि यदि कोई संघ को वास्तव में जानना चाहता है, तो उसे संघ के मूल स्रोतों पर जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “संघ साहित्य में क्या है, इसे ज़मीन पर जाकर देखिए।” उन्होंने कहा कि संघ की शाखा में जाने, दायित्ववान स्वयंसेवकों के जीवन को देखने और उनके कार्यों का प्रत्यक्ष अवलोकन करने से ही संघ को सही मायनों में समझा जा सकता है। उन्होंने शोधार्थियों से अपील की कि वे संघ के प्रति बाहरी छवि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष जानकारी के आधार पर अपनी धारणा बनाएं।
शाखा: व्यक्ति निर्माण की एकमात्र पद्धति
डॉ. भागवत जी ने जीवन और कार्य दोनों को साधने के लिए शाखा को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि शाखा से अनुशासन, सामूहिकता, स्वभाव में सुधार और सबसे महत्वपूर्ण अहंकार नियंत्रण का संस्कार मिलता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संघ का काम केवल व्यक्ति निर्माण का है और इसकी पद्धति एकमात्र शाखा ही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ केवल शाखा चलाता है, जबकि समाज परिवर्तन का बड़ा काम स्वयंसेवक ही करते हैं। स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य खड़े किए हैं। यह सब स्वयंसेवकों के समर्पण से ही संभव हुआ है। उन्होंने कहा, “हमारे यहां किसी चीज का अभाव भी नहीं और प्रभाव भी नहीं, इसलिए सब कुछ ठीक चलता है।”
राष्ट्र सेवा का मूल मंत्र
डॉ. भागवत जी ने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन का विस्तार या कीर्ति अर्जित करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन और उसके आधार पर व्यवस्था परिवर्तन करके देश को श्रेष्ठता की दिशा में ले जाना है, जो कि राष्ट्र निर्माण का अंतिम लक्ष्य है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी कारणवश कोई व्यक्ति शाखा से नहीं जुड़ पाता है, तो भी वह अपने कार्य को उत्कृष्टता, निस्वार्थता और प्रामाणिकता से करके राष्ट्र की सेवा कर सकता है। उन्होंने कहा कि देश का उत्थान केवल संघ का काम नहीं, हम सबका काम है, जिसके लिए डॉक्टर, इंजीनियर और कलाकार की तरह नियमित अभ्यास आवश्यक है। इस संवाद कार्यक्रम में राजस्थान के 34 विश्वविद्यालयों से 260 युवा शोधार्थी और अध्येता शामिल हुए, जो कार्यक्रम की महत्ता को दर्शाता है।