संघ की शक्ति स्वयंसेवकों का भाव बल और जीवन बल: मोहन भागवत
यपुर में पुस्तक विमोचन पर बोले सरसंघचालक जी: विरोध और उपेक्षा के समय वाले भाव बल को बनाए रखना जरूरी; संघ को समझने के लिए प्रत्यक्ष अनुभूति अनिवार्य
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जयपुर में ‘…और यह जीवन समर्पित’ पुस्तक का विमोचन किया, जिसमें राजस्थान के दिवंगत 24 प्रचारकों की जीवन गाथाएँ संकलित हैं।
- उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ केवल स्वयंसेवकों के ‘भाव बल’ और ‘जीवन बल’ से ही चलता है, और हर स्वयंसेवक को मानसिकता से प्रचारक होना चाहिए।
- डॉ. भागवत ने स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि वे संघ के कठिन शुरुआती दिनों के भाव बल को बनाए रखें और प्रचारकों के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र को आलोकित करें।
समग्र समाचार सेवा
जयपुर, 16 नवंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने रविवार को जयपुर में ज्ञान गंगा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तक ‘…और यह जीवन समर्पित’ का विमोचन किया। पाथेय कण संस्थान के नारद सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. भागवत ने संघ की आंतरिक शक्ति और स्वयंसेवकों की भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला। यह पुस्तक राजस्थान के दिवंगत 24 प्रचारकों के समर्पित जीवन की गाथाओं का संकलन है।
सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि संघ की असली शक्ति उसकी बाहरी सुविधाओं या अनुकूलताओं में नहीं, बल्कि उसके स्वयंसेवकों के भाव बल और जीवन बल में निहित है। उन्होंने कहा, “मानसिकता से हर स्वयंसेवक प्रचारक ही हो जाता है। संघ की यही जीवन शक्ति है। संघ यानी हम स्वयंसेवक हैं। संघ यानी स्वयंसेवकों का जीवन और उनका भाव बल है।”
विपक्ष और उपेक्षा के समय वाले भाव को बचाना जरूरी
डॉ. भागवत ने माना कि आज संघ का कार्य बढ़ गया है, और अनुकूलताएँ तथा सुविधाएँ भी बढ़ी हैं। हालांकि, उन्होंने इसके साथ आने वाले नुकसानों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे उसी भाव बल को बनाए रखें जो संघ को उसके विरोध और उपेक्षा के शुरुआती समय में प्राप्त था। उन्होंने कहा कि उसी भाव बल से संघ आगे बढ़ता रहेगा और अपनी शताब्दी वर्ष को सार्थकता देगा।
सरसंघचालक जी ने बताया कि संघ को केवल देखकर या सुनकर समझा नहीं जा सकता; इसे समझने के लिए प्रत्यक्ष अनुभूति की आवश्यकता होती है, जो संघ में आने के बाद ही प्राप्त हो सकती है। उन्होंने अतीत के अनुभवों को याद करते हुए कहा कि कई लोगों ने संघ की स्पर्धा में शाखाएँ चलाने का प्रयास किया, लेकिन पंद्रह दिन से ज़्यादा किसी की शाखा नहीं चली, जबकि संघ की शाखाएँ सौ साल से चल रही हैं और निरंतर बढ़ रही हैं। इसका एकमात्र कारण स्वयंसेवकों का निःस्वार्थ समर्पण है।
प्रचारकों का जीवन देता है प्रेरणा
डॉ. मोहन भागवत ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि आज संघ का कार्य समाज के स्नेह और चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि सौ साल पहले किसने कल्पना की होगी कि हवा में डंडे घुमाने और सिर्फ शाखा चलाने से राष्ट्र का कुछ होने वाला है, लेकिन आज संघ अपनी शताब्दी वर्ष मना रहा है और समाज में उसकी स्वीकार्यता बढ़ी है।
उन्होंने विमोचित पुस्तक ‘…और यह जीवन समर्पित’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संकलन केवल गौरव की भावना नहीं जगाता, बल्कि कठिन रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी देता है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि वे इन दिवंगत प्रचारकों की परंपरा को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारें। उन्होंने कहा, “यदि उनके तेज का एक कण भी हमने अपने जीवन में धारण कर लिया, तो हम भी समाज और राष्ट्र को आलोकित कर सकते हैं।”
कार्यक्रम का आरंभ पुस्तक के संपादक भागीरथ चौधरी द्वारा परिचय और प्रस्तावना के साथ हुआ। अंत में, ज्ञान गंगा प्रकाशन समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरलीधर शर्मा ने आभार प्रकट किया। समिति के उपाध्यक्ष जगदीश नारायण शर्मा ने सरसंघचालक जी का अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया।