गठबंधन,गाँठबंधन या राष्ट्रवंदन ?

घर हो या राजनीति-बिना गठबंधन के कुछ भी सम्भव नहीं दिखता.जहाँ देखे,वही गठबंधन.गठबंधन भारत में हो या विश्व के कई देशों में,वैश्विक तौर पर ये फार्मूला सफल राजनीति का एक नया नुस्खा बन गया है.क्या अब गठबंधन राष्ट्र वंदन हो गया है? यह चिंता और चिन्तन का मसला है.कभी देश में एक दल की सरकार होती थी,परन्तु देश की दशा और दिशा में जिस प्रकार तेजी से बदलाव हुआ,उसका प्रभाव राजनीति पर भी पड़ा.

भारत में गठबंधन को लेकर सभी राजनीतिक दलों का चरित्र एक जैसा हो गया है.उन सभी द्लो में एक गज़ब का उत्साह देखा जा रहा है.उनमे उमंग है ,तरंग है,चुस्ती है और मुस्तैदी भी.क्योकि सभी दलों को आम जनता के नाम पर सत्ता और सिंहासन की चाह है. जनता बेचारी और राजनेता मदारी.

तेजी से बदलते परिवेश में भारत में गठबंधन एक नया राजनीतिक धर्म बन गया है.जिसके  दरबार में हर दलों के नेता अपने अपने सर झुकाने को तैयार है.गठबंधन नहीं तो सरकार नहीं.गठबंधन बनते भी हैं तो बिगड़ते भी.सजते भी हैं तो संवरते भी.क्योकि गठबंधन राग भी है तो विराग भी.सुर भी है तो ताल भी.गठबंधन जैसी व्यवस्था में  आकर्षण और विकर्षण क्षमता भी है.जिसे समयनुसार परख भी करनी होती है.जो जब जीता वो सिकंदर.जो हारा,वो सदन के बाहर !

भारतीय राजनीति में सम्बन्धित दलों को समय समय पर गठबंधन से फायदा भी हुआ है तो कुछ को नुकसान भी.जिसने सत्ता प्राप्त कर ली.वो गठबंधन सफल हो गया.जो उससे चूक गया.वो दीन-हीन बेचारा कांग्रेस की तरह हो जाता है.परंतु कांग्रेस और अन्य दलों के चरित्र  में काफी फर्क है.

भारत के परिपेक्ष्य में गठबंधन-नहीं तो कुछ भी नहीं.गठबंधन से कोई अछूता नहीं.गठबन्धन एक ऐसा राजनीतिक धर्म बन गया है ,जिसके मठ में सभी दलों को अपना अपना मत्था टेकना पड़ रहा है.बेचारे उन सभी दलों को अपने अपने दुखड़े हैं,तो उसका समाधान भी उन सभी सम्बन्धित दलों के पास है.

भारतीय राजनीति में गठबंधन की असली शुरुआत नेहरु काल के बाद शुरू होता है.वैसे तो उसकी सुगबुगाहट पंडित नेहरु के प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही शुरू हो गयी थी,लेकिन उस पर असली खेल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की विशेष कूटनीतिक शैली से शुरू हुआ,जो आजतक कमोबेश हर सरकार में दिखाई दे रहा है .

गठबंधन की स्थिति में देश को झोकने का काम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने किया.उनकी तानाशाही रवैये की वजह से देश को आपातकाल झेलना पड़ा.क्योकि इंदिरा गाँधी को हारना पसंद नहीं था.बाद में कांग्रेस रहित सभी दलों के नेताओं ने इंदिरा गाँधी को उनके सिहांसन से बेदखल करने की ठान ली.जनसंघ समेत सभी समाजवादी दलों ने एक मुहिम चलाया.जो छात्र आन्दोलन के नाम से चर्चित हुआ.उसके सर्वेसर्वा लोकनायक  जयप्रकाश नारायण थे.1977 में इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा और समाजवादी नेता मोरारजी देसाईं देश के नए प्रधानमंत्री बनाये गए.लेकिन कोई कुछ भी कहे कांग्रेस को सरकार चलाना आता है.वो सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी.फिर 1980 में इंदिरा गाँधी ने अपनी खोयी गद्दी हथिया ली.परन्तु अफ़सोस.वो ज्यादा दिनों तक उस सत्ता सुख का उपभोग नहीं कर सकी.1984 में उनके सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी.देश में एक बार फिर से अस्थिरता का माहौल बनने को हुआ,लेकिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जैसो की सूझ -बूझ से इंदिरा गाँधी के पायलट पुत्र और पार्टी के महासचिव राजीव गाँधी देश के नए प्रधानमंत्री बने.उस काल को राजनीति में इंदिरा लहर के नाम से जाना जाता है.

1984 के उस इंदिरा लहर में कांग्रेस को 414 सीटें मिली थी,जबकि आंध्र प्रदेश की तेलुगु देसम पार्टी को 30 सीटे.उस वक़्त एनटी रामाराव की वजह से उनकी पार्टी तेलुगु देसम देश की नम्बर दो पार्टी बन गयी थी.परन्तु 1989 में कांग्रेस में कथित बोफोर्स घोटाले की वजह से पार्टी में विद्रोह हो गया.राजीव सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गाँधी और कांग्रेस के खिलाफ खुली बगावत कर दी और राष्ट्रीय मोर्चा की नई सरकार श्री  सिंह के नेतृत्व में बन गयी.जिसे अन्य दलों के साथ भाजपा का भी समर्थन था.ये भी एक बड़ी बात है कि एक दुश्मन कांग्रेस को निपटने के लिए भाजपा और वाम दलों एक साथ राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को समर्थन दिया.हालाँकि उसे राष्ट्र हित का नाम दिया गया था.

यदि सूक्ष्मता से देखा जाये तो ये वही वक़्त है ,जब भारत में गठबंधन सरकार का पौधा धीरे धीरे अपना जड़ मज़बूत करता चला गया.वो काल भारतीय राजनीति का सर्व ग्रास काल कहा जा सकता है.वो विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भी ज्यादा नहीं चल पाई.बाद में समाजवादी नेता चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने.फिर वो भी महज़ चार महीने में चलते बने.उनका नारा था-चालीस साल बनाम चार महीने.उस काल में देश में हुए नुकसान को लेकर सभी सम्बंधित दलों को जिम्मेवार कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. उसके बाद 1991,1996,1998,1999,2004,2009 और 2014 में गठबंधन की सरकारे ही देश को नसीब हुयी.1991 में कांग्रेस की सरकार किसी तरह गिरते पड़ते चली.

वो 1991 था और आज 2019 है.इन 28 वर्षो में भारतीय राजनीति ने कई उतार चढाव आये.देश ने कई नेताओ के रंग-ढंग और फितरतों से रूबरू हुआ.सभी दलों के अपने अपने दावें है व वादें भी.लेकिन इन 28 वर्षों के उन वादा पत्रों की पड़ताल बारीकी से की जाए तो कोई भी दल ईमानदारी और देश सेवा के मानदंडों पर खरा नहीं उतरेगा.पर ये हमारा लोकतंत्र है.जनतंत्र है.गणतंत्र है और प्रजातंत्र है.ये जो बोले वही सही.

गठबंधन की तो कई कहानियां देश हित के नाम पर लिखी गयी और मिटाई गयी.परन्तु असमान विचारों वाली वपक्ष के गाँठ-बंधन की कहानी पहली बार  2019 में लिखी जा रही है .जो कि देश के लिए सत्यानाश के अलावा कुछ भी नहीं कहा जा सकता.

भाजपा ने तो गठबंधन किया है ,जिसमे समान विचार और भाव वाले दल है ,लेकिन विपक्ष के गाँठ-बंधन में तो सब वैसे दल है जो कल तक एक दुसरे के खून के प्यासे थे.जो अचानक आज दोस्त हो गए हैं .ये कैसे सम्भव है.कल तक वे सभी दल-ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ,शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी,मायावती की बसपा ,अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ,अजित सिंह की रालोद,चन्द्रबाबू की तेदपा एवं अन्य छोटे छोटे दल.एक दुसरे के दुश्मन थे,आश्चर्य है कि  वे अपनी तुच्छ स्वार्थों से एक दुसरे को दोस्त बता रहें हैं .इन सभी दलों के विचार तो दूर इतिहास और भूगोल में भी कई स्तर पर फर्क है.ना दिल मिला है न ही दिमाग.

उदाहरण के तौर पर देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश में कहने को तो सब साथ साथ हैं,लेकिन सब है अलग अलग.कांग्रेस से अलग हैं सपा और बसपा. आपस में किसी भी स्तर पर नहीं बनी.वे एक दुसरे को फूटी आँखों तक नहीं सुहाते थे.परन्तु आज अचानक ऐसा क्या हो गया कि सब के सब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हटाने के लिए एक साथ हो गए? ऐसा क्यों ? उन सभी का एक ही एजेंडा है –मोदी हटाओं.जबकि प्रधानमंत्री मोदी और उनके गठबंधन दलों का नारा है –देश बनाओ और देश को आगे बढाओ.

वर्षो तक देश पर अन्याय करने वाली पार्टी कांग्रेस अब मोदी रूपी प्रहार से डर कर न्याय की बातें करने लगी है.आज की तारीख में देखा जाये तो इन सभी दलों की अपने अपने राज्यों में हालत काफी पतली बताई जा रही हैं.सभी दलों के एक दुसरे के प्रति किस्म किस्म के गाँठ हैं.जब गाँठ होंगे तो उनमे बंधन कैसे होगा.मायावती स्वयं को प्रधानमंत्री बताते नहीं अघा रही.ममता बनर्जी भी प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार है .वह तो खुले आम कहती घूम रही है कि उनके बंगाल में कांग्रेस,सीपीएम् और भाजपा एक साथ मिलकर उनको हराने में लगे हुए हैं.मायावती के पीएम बनने को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश मुस्कुराते हुए कहते है –अभी नम्बर तो आने दीजिये.सच में, इन दलों की विचित्र स्थिति है.

इन तमाम परिस्थितियों पर मेरा सवाल है सबसे –देश से ,विदेश में रहने भारतीयों और अप्रवासी भारतीयों से, सभी पाठकों से भी .देश बड़ा हैं या और कुछ ? क्या भारत जैसा देश किसी की बपौती है? क्या भारत की जनता गूंगी और बहरी है ? क्या भारत का युवा जाहिल है ? क्या भारत की माताएं और बहनो को अपना देश का विकास नहीं दीखता.यदि हम इन सभी मसलों पर चिंता और चिंतन करे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ झंडा उठाने वालों में से कौन सा दल ईमानदार है ?कांग्रेस ने कुछ अख़बारोंमें छपी ख़बरों की  मदद से श्री मोदी को विला-वजह बदनाम करने की असफल कोशिश कर रही हैं ,जिसे आने वाले दिनों में भारत की जनता एक एक कथित और मनगढ़ंत आरोपों का जवाब दे देगी.

प्रधानमंत्री श्री मोदी और भाजपा के खिलाफ कांग्रेस है,जिसकी उम्र 134 साल है,जबकि भाजपा की उम्र महज़ 39 साल है.भाजपा एक गठबंधन में है,जबकि विपक्ष तथाकथित एक गाँठ-बंधन में .इसलिए मेरा विचार है कि गठबंधन तो ठीक है लेकिन कोई किसी प्रकार का तथाकथित गाँठ वाला बंधन देश में नहीं बने तो वो देश हित में होगा.

और अंत में, गठबंधन की जरुरत क्यों? इसका क्या कारण है? क्यों आम मतदाता गण किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत क्यों नहीं दे रहें .क्यों छोटे छोटे क्षेत्रीय दल मज़बूत हो रहे हैं ? राष्ट्रीय दलों की हालत खस्ता क्यों हैं ? उन सभी दलों में स्वहित बड़ा क्यों है देश या राज्य हित से.वैसे तो वे राज्य हित की बात करते हैं तो देश को क्यों तवज्जो नहीं देते?इन सभी मसलो पर समग्र चिंतन की जरुरत है .

मेरे विचार से समाज में जिस प्रकार से असत्य,अविश्वास और निहित स्वार्थ  अपना फण फैला रहा है.उससे इस प्रकार की समस्याएं जन्म ले रही हैं .इस वजह से सभी दलों में भ्रम की स्थिति भी दिखाई दे रही हैं .ये एक राष्ट्रीय ज्वलंत सवाल भी है .

किसी भी दल में अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं है ,क्योकि उनके लिए  आम जन महत्वपूर्ण नहीं,बल्कि निहित स्वार्थ.इसलिए सभी दलों को अपना अपना आत्म चिंतन करना होगा,तभी हम देश और समाज में जन विश्वास को पुनःस्थापित कर देश हित में एक नया अध्याय लिख सकेंगे और गठबंधन या गाँठ –बंधन रूपी शाप से देश को मुक्त करा सकेंगे.जिससे भारत एक बार फिर विश्व गुरु के तौर पर राष्ट्र वंदन की भावना को  पुनःस्थापित किया जा सकेगा.

*कुमार राकेश

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