ज़िन्दगी का स्वांग
*एम.एल. नत्थानी
अक्सर खुले गगन में मन
उन्मुक्त उड़ना चाहता है
बंदिशों की बेड़ियों से दूर
फिर विचरना चाहता है ।
मंजिल सामने खड़ी जैसे
ये पैरों में बेड़ियां होती है
अधूरी हसरतों के साथ
आंखों में लड़ियां होती हैं…
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