जब पश्चिम खुद वही करने लगे, जिसे वह “पुराना” कहकर हँसता था
पूनम शर्मा
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के भीतर जो हलचल दिख रही है, वह किसी एक देश या संस्था तक सीमित नहीं है। यह एक गहरे बदलाव का संकेत है—ऐसा बदलाव, जिसे अब तक दबाया गया, टाला गया और मज़ाक में उड़ाया गया। लेकिन अब वही…
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