पत्थर और शीशा
पत्थर और शीशा
जो कभी मेरे छूने से पिघल जाया करती थी
आज मुझ से बात करने से भी कतराती है।
अब कोई क्या करे, कब तक पत्थर से टकराए
क्योंकि पत्थरों से बात नहीं होती
पत्थर वही दोहराते हैं जो वे सुनते हैं
प्रतिध्वनि गूँजती है बस , वार्तालाप…