पूनम शर्मा
यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है
भारत की न्यायपालिका को हमेशा लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की अंतिम रक्षक संस्था के रूप में देखा गया है। आम लोगों के लिए अदालतें अक्सर आखिरी उम्मीद होती हैं, खासकर तब जब सरकारें विफल हों, नेता सत्ता का दुरुपयोग करें या अन्य संस्थाएं कमजोर पड़ जाएं। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब खुद न्यायपालिका ही आलोचना के घेरे में आ जाए। क्या नागरिक जजों, फैसलों और न्यायिक व्यवस्था पर खुलकर सवाल उठा सकते हैं?
हाल के दिनों में एक लॉ छात्र ऋषि कुमार को लेकर सामने आई चर्चाओं ने इस बहस को तेज कर दिया है। आरोप है कि उन्होंने न्यायपालिका और कथित न्यायिक भ्रष्टाचार पर एक तीखा लेख लिखा, जिसके बाद उन पर दबाव बनाया गया। बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने लेख में यह तर्क दिया कि न्यायिक भ्रष्टाचार कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी समस्या है जिस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
ऋषि कुमार विवाद और बड़ा सवाल
चाहे कोई उनके लेखन के तरीके से सहमत हो या नहीं, लेकिन बड़ा सवाल इससे कहीं आगे का है। किसी भी लोकतंत्र में संस्थाएं आलोचना को दबाकर मजबूत नहीं होतीं। वे तब मजबूत होती हैं जब वे जवाबदेह हों, पारदर्शी हों और कठिन सवालों का सामना करने को तैयार हों।
न्यायपालिका की जवाबदेही क्यों जरूरी है
भारतीय न्यायपालिका के पास बहुत बड़ी शक्ति है। अदालतें कानून रद्द कर सकती हैं, सरकारों के फैसलों को पलट सकती हैं, नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं और अवमानना के नाम पर लोगों को सजा भी दे सकती हैं। इतनी बड़ी शक्ति के साथ जनता का भरोसा भी जरूरी है। लेकिन भरोसा मांगने से नहीं मिलता, उसे कमाना पड़ता है।
अदालतों पर बढ़ते सवाल
पिछले कई वर्षों में अदालतों को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। न्याय मिलने में देरी, कुछ मामलों में तत्काल सुनवाई और कुछ मामलों में वर्षों की प्रतीक्षा, जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, सीलबंद लिफाफों की प्रक्रिया, और यह धारणा कि प्रभावशाली लोगों को आम नागरिकों की तुलना में जल्दी राहत मिल जाती है—इन सबने न्यायपालिका की छवि पर असर डाला है।
ऐसे भी मामले सामने आए हैं जहां जजों या न्यायपालिका से जुड़े लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। कई बार लोगों को लगा कि इन मामलों में जांच कमजोर रही, धीमी रही या हुई ही नहीं। इससे आम लोगों में यह भावना बढ़ी है कि न्यायपालिका अपनी छवि बचाने में ज्यादा सक्रिय है, बजाय इसके कि वह खुद को ज्यादा पारदर्शी बनाए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम अवमानना कानून
यहीं पर अदालत की अवमानना का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अवमानना कानून इसलिए बनाया गया था ताकि अदालतों की गरिमा बनी रहे और झूठे आरोपों से न्यायिक व्यवस्था कमजोर न हो। लेकिन झूठे आरोप और वैध आलोचना में फर्क होता है।
अगर कोई नागरिक किसी फैसले पर सवाल उठाता है, न्यायिक असंगतियों की बात करता है या भ्रष्टाचार के आरोपों पर चर्चा करता है, तो उसे संस्था का दुश्मन नहीं माना जाना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि लोग असहज सवाल पूछ सकें।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यह सही है कि इस अधिकार पर कुछ सीमाएं हैं, जिनमें अदालत की अवमानना भी शामिल है। लेकिन अवमानना का कानून ऐसा हथियार नहीं बनना चाहिए जो जवाबदेही से बचने का माध्यम बन जाए।
अगर कोई छात्र, पत्रकार, वकील या शोधकर्ता रिपोर्ट, दस्तावेज, अदालत के रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाता है, तो उसका जवाब बहस होना चाहिए, दबाव नहीं।
यह मामला सिर्फ एक छात्र तक सीमित नहीं
आज चिंता सिर्फ एक छात्र की नहीं है। चिंता उस संदेश की है जो ऐसे मामलों से पूरे समाज को जाता है। अगर एक लॉ छात्र को न्यायपालिका पर सवाल उठाने के लिए दबाव झेलना पड़ सकता है, तो बाकी लोग भी सच बोलने से डरेंगे। और जब लोग डरने लगते हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
सम्मान पारदर्शिता से आता है
न्यायपालिका का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सम्मान डर के जरिए नहीं बनता। वह निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है। अदालतों को आलोचना को हमला नहीं, बल्कि समाज की प्रतिक्रिया के रूप में देखना चाहिए। जितनी शक्तिशाली कोई संस्था होगी, उतना ही उसे सवालों के लिए खुला होना चाहिए।
आखिरकार लोकतंत्र में कोई भी संस्था जनता के सवालों से ऊपर नहीं हो सकती—न संसद, न सरकार, न मीडिया और न ही न्यायपालिका।