सहानुभूति नहीं, राजनीतिक शक्ति चाहिए: दिव्यांग सशक्तिकरण पर डॉ. उत्तम ओझा का बेबाक संदेश

डॉ. उत्तम ओझा, जो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके हैं और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के दिव्यांग प्रकोष्ठ के राज्य समन्वयक हैं, ने दिव्यांगजनों के लिए राजनीति में 5% आरक्षण की जोरदार माँग उठाई है। उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि दिव्यांग समाज को केवल “कल्याण” (welfare) तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें “सत्ता और भागीदारी” (power) में भी बराबर का हक मिले। डॉ. ओझा ने इस सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न से जोड़ते हुए कहा कि यही असली सशक्तिकरण है।

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एक बेबाक, स्पष्ट और राजनीतिक रूप से धारदार बातचीत में डॉ. उत्तम ओझा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह बात रखी कि भारत का “दिव्यांग समाज” अब केवल कल्याण की सीमाओं में बंधा नहीं रह सकता—उसे सत्ता के केंद्र में अपनी जगह बनानी ही होगी। एक सफल चिकित्सक का सुरक्षित करियर छोड़कर सामाजिक सक्रियता का रास्ता चुनने वाले डॉ. ओझा अपनी बात को तथ्यों, अनुभव और एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि के साथ मजबूती से रखते हैं।

28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों और 700 से अधिक जिलों का व्यापक दौरा कर चुके डॉ. ओझा ने जमीनी स्तर पर गहराई से काम किया है। उन्होंने लाखों दिव्यांगजनों तक सीधी पहुँच बनाकर उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने, जागरूकता फैलाने और सुगम्यता सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। उनकी यह यात्रा  केवल सेवा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक बड़े राष्ट्रीय अभियान का रूप ले चुकी  है।

दिव्यांग अधिकारों, राजनीतिक सशक्तिकरण और समावेशी शासन को लेकर डॉ. उत्तम ओझा एक सशक्त, व्यावहारिक और नीतिगत दृष्टिकोण सामने रखते हैं, जो न केवल  धरातल  से जुड़ा है बल्कि भविष्य की दिशा भी तय करता है।

ग्लोबल गवर्नेंस न्यूज़ ग्रुप की कंटेंट प्रमुख  हर्षिता राय ने उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के दिव्यांग प्रकोष्ठ के राज्य समन्वयक डॉ. उत्तम ओझा से इस विशेष बातचीत में इन तमाम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की, जहाँ  उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात रखी।

प्रश्न 1: आपने कई वर्षों तक मेडिकल क्षेत्र में काम किया। फिर आपको दिव्यांगजनों के लिए पूर्णकालिक काम करने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर: “मैं लंबे समय से दिव्यांगजनों के लिए काम कर रहा था। इस दौरान एक बात मुझे बहुत स्पष्ट रूप से समझ में आई। साल 2018 में मुझे 2016 के दिव्यांगजन कानून के तहत केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का सदस्य बनने का अवसर मिला। वहाँ  काम करते हुए मैंने सिस्टम को बहुत करीब से देखा।

मुझे महसूस हुआ कि जब तक दिव्यांगजनों को राजनीतिक ताकत नहीं मिलेगी, तब तक उनके जीवन में असली बदलाव संभव नहीं है। मैंने यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, जेपी नड्डा जी और अमित शाह जी जैसे वरिष्ठ नेताओं के सामने भी रखी। मैंने लगातार इस दिशा में पहल करने की जरूरत पर जोर दिया।”

प्रश्न 2: आप अक्सर दिव्यांगजनों की राजनीतिक ताकत की बात करते हैं। क्या इसे आंकड़ों के साथ समझा सकते हैं?
उत्तर: “अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो आज दिव्यांगजन खुद करीब 90 लाख मतदाता हैं। पूरे देश में उनकी संख्या लगभग 10 करोड़ के आसपास है। अगर हम उनके परिवार के सदस्यों को भी जोड़ लें—मान लीजिए हर परिवार में औसतन तीन वोट—तो यह संख्या करीब 30 करोड़ तक पहुँच  जाती है।

भारत में सरकारें आमतौर पर 18 से 21 करोड़ वोटों से बनती हैं। इसका मतलब है कि दिव्यांगजन सरकार बनाने या बदलने की ताकत रखते हैं। यह सिर्फ एक सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि एक निर्णायक लोकतांत्रिक शक्ति है, जिसे संगठित और राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”

प्रश्न 3: भाजपा में दिव्यांग प्रकोष्ठ बनाने का विचार कैसे आया?
उत्तर: “जब मैंने यह सोच साझा की, तो उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा के महासचिव रहे सुनील बंसल जी ने इसे गंभीरता से लिया। उनके समर्थन से पहली बार किसी राजनीतिक दल के भीतर दिव्यांगजनों के लिए एक अलग प्रकोष्ठ बनाया गया।

साल 2021 में मुझे इसका संस्थापक समन्वयक बनने का दायित्व मिला । यह सिर्फ संगठनात्मक कदम नहीं था, बल्कि एक नई राजनीतिक सोच की शुरुआत थी, जिसने उत्तर प्रदेश को पूरे देश के लिए एक मॉडल के रूप में स्थापित किया।”

प्रश्न 4: जमीनी स्तर पर दिव्यांगजनों के लिए सरकारी योजनाएँ  कितनी प्रभावी हैं?
उत्तर: “अगर हम 2014 से पहले और बाद के समय को देखें, तो फर्क साफ नजर आता है। पहले योजनाएँ  ज्यादातर गैर सरकारी संगठनों  तक सीमित थीं और लाभ सीधे लोगों तक नहीं पहुँचता  था।

आज देशभर में कैंप लगाए जा रहे हैं,  जहाँ व्हीलचेयर, ट्राइसाइकिल और हियरिंग एड जैसे उपकरण बड़ी संख्या में वितरित किए जा रहे हैं। इससे उनकी गतिशीलता बढ़ी है और शिक्षा, रोजगार व समाज में भागीदारी आसान हुई है।

यह एक बुनियादी बदलाव है, क्योंकि बिना चल-फिर पाने की सुविधा के कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता। अब इस बाधा को व्यवस्थित तरीके से दूर किया जा रहा है।”

प्रश्न 5: अभी भी कौन-कौन सी बड़ी कमियां बाकी हैं?
उत्तर: “दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 ने बड़ा बदलाव लाया है, लेकिन कई राज्यों में इसका पूरी तरह से क्रियान्वयन अभी बाकी है। कुछ राज्यों में अलग विभाग बनाए गए हैं, जबकि कई जगह अभी इसकी शुरुआत भी नहीं हुई।

अगर इस कानून को पूरे देश में सही तरीके से लागू कर दिया जाए, तो दिव्यांगजनों की अधिकांश समस्याओं का समाधान हो सकता है।”

प्रश्न 6: रोजगार अभी भी बड़ी चुनौती है। इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
उत्तर: “इस समय ध्यान स्किल डेवलपमेंट और काउंसलिंग पर है। सरकार के हालिया बजट में भी दिव्यांगजनों के प्रशिक्षण और रोजगार सृजन पर खास जोर दिया गया है।

हम पार्टी के स्तर पर भी यह कोशिश कर रहे हैं कि जो दिव्यांगजन काम करने में सक्षम हैं, उन्हें अवसर मिले—ताकि वे केवल पेंशन पर निर्भर न रहें, बल्कि आत्मनिर्भर बनें।”

प्रश्न 7: सुगम्यता (Accessibility) आज भी एक बड़ी समस्या है। इस पर क्या प्रगति हुई है और क्या बाकी है?
उत्तर: “2015 में शुरू हुआ ‘सुगम्य भारत अभियान’ एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और सरकारी दफ्तरों में काफी सुधार लेकर आया है।

पहले काशी विश्वनाथ मंदिर तक दिव्यांगजन पहुँच  ही नहीं पाते थे, क्योंकि गलियां बहुत संकरी थीं। अब कॉरिडोर बनने के बाद पहुँच  आसान हुई है। हालांकि घाटों पर अभी भी पूरी सुविधा नहीं है।

मैंने 2018 में घाटों पर रैंप बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन वह अभी तक लागू नहीं हो पाया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ  तुरंत काम करने की जरूरत है।”

प्रश्न 8: दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण में तकनीक की क्या भूमिका है?
उत्तर: “तकनीक आज गेम-चेंजर साबित हो रही है। आज कई दिव्यांगजन घर बैठे लैपटॉप और मोबाइल के जरिए मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे हैं।

आईआईटी जैसे संस्थान नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं, जो जीवन को और आसान बना रही हैं। विज्ञान और तकनीक के जरिए दिव्यांग की  बाधाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है और आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है।”

प्रश्न 9: दिव्यांगजनों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर आपका क्या रुख है?
उत्तर: “नौकरियों में आरक्षण 3% से बढ़कर 4% हुआ है और उच्च शिक्षा में भी लगभग 4–5% तक पहुँचा  है। लेकिन राजनीति में अभी भी उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है।

हमारी माँग  है कि राजनीति में भी कम से कम 5% आरक्षण दिया जाए। जब तक विधायिका में उनकी आवाज नहीं होगी, नीतियां अधूरी रहेंगी।

हालांकि कुछ सकारात्मक उदाहरण भी सामने आए हैं—जैसे सी. सदानंदन मास्टर को जिम्मेदारी दी गई, और पैरालंपियन देवेंद्र झाझरिया को राजस्थान के चूरू से टिकट दिया गया। भले ही वे चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन उन्होंने एक सशक्त  चुनाव लड़ा।

यह बदलाव शुरू हो चुका है, लेकिन इसे मजबूत करने में समय लगेगा। असली परिवर्तन राजनीतिक सशक्तिकरण से ही आएगा।”

प्रश्न 10: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां किस तरह अलग हैं?
उत्तर: “शहरी इलाकों में सुविधाएँ  और कनेक्टिविटी बेहतर हैं, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अभी बहुत काम करने की जरूरत है—मुख्यतः   शिक्षा, पुनर्वास और स्वास्थ्य के क्षेत्र में।

ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। इसलिए नीतियों में इन असमानताओं को ध्यान में रखते हुए काम करना जरूरी है।”

प्रश्न 11: आप कहते हैं कि दिव्यांगता सिर्फ एक मंत्रालय का विषय नहीं होना चाहिए—क्यों?
उत्तर: “दिव्यांगता किसी एक मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं है। यह हर मंत्रालय से जुड़ा मुद्दा है—चाहे वह ग्रामीण विकास हो, परिवहन, आवास या शिक्षा।

साथ ही, जब देश की लगभग 10% आबादी दिव्यांग है, तो उनके लिए एक अलग ‘दिव्यांग मंत्रालय’ बनाने की जरूरत भी महसूस होती है।”

प्रश्न 12: आगे का आपका रोडमैप क्या है?
उत्तर: “अभी कई राज्यों में दिव्यांग प्रकोष्ठ बन चुका है। अब हमारा लक्ष्य इसे राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार देना है।

साथ ही, अन्य राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। लोकतंत्र में भागीदारी जरूरी है, और दिव्यांगजनों को सक्रिय भागीदार बनना होगा।

प्रश्न 13: व्यक्तिगत तौर पर आपको इस दिशा में काम करने की प्रेरणा कहाँ  से मिली?
उत्तर: “मुझे देश के शीर्ष नेतृत्व से प्रेरणा मिली। जब मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को सम्मान और समावेश पर काम करते देखा, तो मेरा विश्वास अधिक  सुदृढ़  हुआ कि यही सही दिशा है।

तभी मैंने तय किया कि मैं स्वयं  को पूरी तरह इस मिशन के लिए समर्पित कर दूँगा ”

प्रश्न 14: समाज और दिव्यांगजनों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: “पिछले एक दशक में भारत में दिव्यांगजनों के लिए जिस स्तर पर काम हुआ है, वह वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व है। आज दिव्यांगजन हाशिये पर नहीं, बल्कि केंद्र में हैं।

मैं दिव्यांगजनों से कहना चाहता हूँ  कि स्वयं पर विश्वास रखें और आत्मविश्वास बढ़ाएँ । वहीं समाज से मेरी अपील है—सहानुभूति से आगे बढ़ें।

दया मत दिखाइए, अवसर दीजिए। दिव्यांगजनों को सहानुभूति नहीं, समान अवसर और सम्मान चाहिए। तभी हम एक समावेशी भारत बना पाएँगे और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे, जिसमें दिव्यांगजन अहम भूमिका निभाएँगे।”

निष्कर्ष:
डॉ. उत्तम ओझा के साथ यह बातचीत एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है—जहाँ  सोच ‘कल्याण’ से ‘सशक्तिकरण’ की ओर बढ़ रही है, ‘सहानुभूति’ से ‘रणनीति’ की ओर, और ‘प्रतिनिधित्व’ से ‘सक्रिय भागीदारी’ की ओर। यह भारत में समावेशी शासन के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।

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