पश्चिम बंगाल में चुनावी जंग: ममता की चुनौती और चुनाव आयोग का कड़ा रुख

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पूनम शर्मा
देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व, चुनाव, अपने पूरे रंग में है। और इस पर्व के केंद्र में फिलहाल पश्चिम बंगाल है। यहाँ  का चुनावी माहौल किसी हाई-वोल्टेज ड्रामा से कम नहीं। नेताओं के जुबानी हमले, आरोप-प्रत्यारोप और चुनाव आयोग के ताबड़तोड़ फैसले, सब मिलकर एक ऐसी कहानी गढ़ रहे हैं, जिसमें सस्पेंस और ट्विस्ट की भरमार है। हाल ही में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के 150 अधिकारियों को चुनावी ड्यूटी से हटाकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। ये अधिकारियों का तबादला नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल को  चुनाव आयोग द्वारा सुधारने की प्रक्रिया जैसी है सत्तापक्ष की  जो उद्दंडता दिख रही थी वह अब  शनै  शनै विलुप्त होने को बाध्य होगी ।

चुनाव आयोग का सख्त तेवर: 15 IPS अधिकारियों को हटाने का फैसला

सबसे बड़ा और चर्चित फैसला चुनाव आयोग द्वारा 15 आईपीएस अधिकारियों को चुनावी ड्यूटी से हटाना और बंगाल से बाहर उनकी वैकल्पिक पोस्टिंग को रद्द करना है। यह अपने आप में एक अभूतपूर्व कदम है। आमतौर पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि चुनाव आयोग इतनी बड़ी संख्या में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को सीधे राज्य से बाहर भेज दे। आयोग ने इन अधिकारियों को सीधे “डिपुटेशन” पर भेज दिया है, यानी अब वे चुनाव खत्म होने तक बंगाल से बाहर, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपनी सेवाएं देंगे। इसका कारण यह है कि ये लोग ममता बनर्जी के ही  इशारे पर काम करते थे जिनके बलबूते पर ममता ने स्वेच्छा से शासन चलाया ।

इस फैसले के पीछे चुनाव आयोग की मंशा साफ है: निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना। पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की माँग  लंबे समय से उठ रही है, और चुनाव आयोग ने शायद यह संदेश दिया है कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि, कई लोगों का यह भी मानना है कि ये अधिकारी ममता बनर्जी के करीबी माने जाते थे, और इस फैसले को सत्ताधारी दल को कमजोर करने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है।

ममता बनर्जी का गुस्सा और ‘संस्थाओं पर हमला’ का आरोप

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस फैसले पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने ट्वीट करके चुनाव आयोग पर हमला बोला और इसे “संवैधानिक संस्थाओं पर हमला” करार दिया। ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग ने उनसे बिना पूछे यह कार्रवाई की है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग अधिकारियों के भरोसे चुनाव जीतना चाहता है, या जनता के भरोसे? यह बात तो ममता बनर्जी से भी पूछी जा सकती है ,यह दर्शाता है कि यह फैसला बंगाल की राजनीति में कितना गहरा असर डालेगा।

नंदिग्राम की अहमियत और स्मिता पांडे का रोल

चुनावी रणनीतियों के बीच, एक नाम और चर्चा में है – स्मिता पांडे। स्मिता पांडे, जिन्हें नंदिग्राम में चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, पहले भी ममता बनर्जी के निशाने पर रह चुकी हैं। 2021 के विधानसभा चुनावों में, ममता बनर्जी ने स्मिता पांडे पर नंदिग्राम में चुनावी हेरफेर का आरोप लगाया था बात यह थी कि स्मिता पांडे ने चुनाव में  ममता के हेराफेरी का समर्थन करने से मना कर दिया था ।  अब जब उन्हें दोबारा उसी अहम सीट पर तैनात किया गया है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनावी जंग क्या मोड़ लेती है। नंदिग्राम, जहां ममता बनर्जी खुद मैदान में हैं, इस बार भी हाई-प्रोफाइल सीट बनी हुई है।

बाहरी अधिकारियों की तैनाती और सुरक्षा का भारी-भरकम इंतजाम

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में बाहरी अधिकारियों की तैनाती भी की है, जिसमें राजस्थान के 17 आईएएस और 21 अन्य अधिकारी शामिल हैं। यह कदम भी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

सुरक्षा व्यवस्था की बात करें तो, चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में 1000 कंपनी अर्धसैनिक बलों को तैनात करने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि प्रत्येक चरण में लगभग 2.5 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात रहेंगे। यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे लोकसभा चुनाव में देश भर में 3.4 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं। पश्चिम बंगाल में इतनी भारी सुरक्षा व्यवस्था, साफ संकेत है कि चुनाव आयोग किसी भी कीमत पर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव चाहता है।

आचार संहिता और विकास कार्यों पर रोक

चुनावी आचार संहिता के मद्देनजर, चुनाव आयोग ने स्थानीय क्षेत्र विकास फंड (MLA/MP फंड) पर भी रोक लगा दी है। यह फैसला भी चुनाव के बाद तक लागू रहेगा, ताकि राजनीतिक दल धनबल का दुरुपयोग न कर सकें।

आगे क्या ?

पश्चिम बंगाल का यह चुनावी संग्राम सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित नहीं है। यह राज्य की राजनीति, चुनाव आयोग की स्वायत्तता और संवैधानिक संस्थाओं के रोल पर कई सवाल खड़े करता है। ममता बनर्जी जहाँ  “बंगाल झुकेगा नहीं” का नारा दे रही हैं, वहीं चुनाव आयोग अपनी सख्ती से सबको निष्पक्षता का संदेश दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस हाई-स्टेक चुनावी ड्रामा का अगला अंक क्या होता है ।

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