पूनम शर्मा
पिछले कुछ वर्षों में भारत की वैश्विक छवि केवल एक बड़े बाजार की नहीं, बल्कि एक उभरते हुए ‘डिफेंस एक्सपोर्टर’ की बनी है। एक समय था जब हम अपनी छोटी-छोटी रक्षा जरूरतों के लिए दूसरे देशों का मुंह ताकते थे, लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। ‘ऑपरेशनल सिंदूर’ के बाद से भारत के रक्षा खरीद पैटर्न में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है—विदेशी आयात में भारी कमी आई है और घरेलू उत्पादन (Domestic Production) लगभग 60% तक पहुंच गया है। लेकिन, क्या भारत की यह आत्मनिर्भरता दुनिया की महाशक्तियों को रास आ रही है?
रक्षा निर्यात का बढ़ता दबदबा और वैश्विक पैनिक
आज दुनिया की नई उभरती अर्थव्यवस्थाएं हथियार खरीदने के लिए केवल अमेरिका, रूस या चीन की तरफ नहीं देख रही हैं। वे भारत को एक भरोसेमंद और किफायती विकल्प के रूप में देख रही हैं। अर्मेनिया जैसे देशों के साथ भारत की 3 बिलियन डॉलर की बड़ी डील इसका जीता-जागता उदाहरण है। अर्मेनिया का क्षेत्रीय संघर्ष हो या फिलीपींस की जरूरतें, भारत के स्वदेशी हथियार जैसे ‘पिनाका’ और ‘आकाश’ मिसाइल सिस्टम अपनी लोहा मनवा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही भारत ने वैश्विक बाजार में अपने पैर जमाने शुरू किए, वैसे ही एक अजीबोगरीब पैटर्न देखने को मिला। जब भारत अपने ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टर या ‘तेजस’ फाइटर जेट के लिए किसी देश के साथ डील फाइनल करने वाला होता है, तभी अचानक उन विमानों के क्रैश होने की खबरें आने लगती हैं।
हादसों का रहस्यमयी पैटर्न: इत्तेफाक या साजिश?
अगर हम 2023 से 2026 के बीच के आंकड़ों को देखें, तो एक चिंताजनक सिलसिला दिखाई देता है। तेजस, जो हमारा गौरव है, एयर-शो के दौरान क्रैश हुआ। सुखोई-30 MKI, जो दशकों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ रहा है, असम में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। यहाँ तक कि ‘ध्रुव’ सीरीज के हेलीकॉप्टर, जो दो दशकों से बेहतरीन सेवा दे रहे थे, उनके क्रैश होने की आवृत्ति अचानक बढ़ गई।
सबसे चौंकाने वाली बात ‘मिड-एयर कोलिजन’ (हवा में टकराना) और रडार फेलियर जैसी घटनाएं हैं। ये तकनीकी खामियां उस समय आती हैं जब भारतीय वायुसेना यह घोषणा करती है कि हम अब बाहरी देशों से (जैसे अपाचे सौदे के बाद) और विमान नहीं खरीदेंगे। क्या यह दबाव बनाने की एक कोशिश है ताकि भारत अपनी स्वदेशी तकनीक पर भरोसा खो दे और फिर से विदेशी बाजारों की ओर मुड़ जाए?
वैश्विक हथियार बाजार का ‘इकोसिस्टम’
इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा। अमेरिका जैसे देशों का डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इतना शक्तिशाली है कि वह सरकारों की नीतियां तय करता है। उनके लिए युद्ध जीतना या हारना मायने नहीं रखता, बल्कि उनके हथियारों का बिकते रहना जरूरी है। जब भारत जैसा एक बड़ा खरीदार अचानक ‘विक्रेता’ बन जाता है, तो यह इन बड़ी कंपनियों के ‘पेट पर लात मारने’ जैसा है।
चीन के हथियार ‘प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट’ तक ही सीमित हैं और रूस पर लगे प्रतिबंधों ने खरीदारों को डरा दिया है। ऐसे में भारत का ‘कॉस्ट-फ्रेंडली’ और ‘वॉर-टेस्टेड’ मॉडल वैश्विक दिग्गजों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
केवल आसमान ही नहीं, अंतरिक्ष पर भी वार?
यह पैटर्न केवल वायुसेना तक सीमित नहीं है। इसरो (ISRO), जिसने वर्षों तक बिना किसी चूक के उपग्रह लॉन्च किए, उसके PSLV के चौथे चरण (4th Stage) में अचानक तकनीकी त्रुटियां देखी जाने लगीं। यह वही समय है जब भारत वैश्विक कमर्शियल लॉन्च मार्केट में एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है। एयर इंडिया के विमानों में ‘स्कूपिंग’ के मामले और सुरक्षा से जुड़ी अन्य घटनाएं भी इसी टाइमलाइन के भीतर आती हैं।
निष्कर्ष
भारत आज एक ऐसी दहलीज पर खड़ा है जहाँ उसकी प्रगति कई वैश्विक शक्तियों की आंखों में खटक रही है। जब भी हम कोई नया रक्षा उत्पाद बेचने की कोशिश करते हैं, उसी हथियार या प्लेटफॉर्म के साथ कोई न कोई दुर्घटना जुड़ जाती है। यह एक ‘क्लियर पैटर्न’ की ओर इशारा करता है।
सावधानी और सुरक्षा जांच जरूरी है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि एक ‘जियो-पॉलिटिकल’ युद्ध भी हो सकता है। भारत को अपनी रक्षा संपदा और साख बचाने के लिए अपनी सुरक्षा प्रणालियों को और अधिक पुख्ता करना होगा ताकि ‘मेक इन इंडिया’ की गूंज पूरी दुनिया में बिना किसी रुकावट के सुनाई देती रहे।