पूनम शर्मा
जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए राज्यसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के साथ ही बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले उनके कार्यकाल के समाप्त होने की औपचारिक शुरुआत मानी जा रही है ।
नीतीश कुमार ने कहा कि वे राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ना चाहते हैं और बिहार में बनने वाली नई सरकार को उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने राज्य के लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों से अधिक समय तक जनता ने उन पर भरोसा और समर्थन बनाए रखा। इसी भरोसे की ताकत से उन्होंने बिहार की सेवा पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ की है।
उन्होंने लिखा कि जनता के विश्वास और समर्थन की बदौलत ही बिहार आज विकास और सम्मान की नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है।
नीतीश कुमार ने यह भी बताया कि अपने संसदीय जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा रही है कि वे राज्य की विधानमंडल की दोनों सदनों और संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनें। इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस बार होने वाले राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार बनने का निर्णय लिया है।
मुख्यमंत्री पद से उनके हटने के बाद माना जा रहा है कि बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की नई सरकार बनेगी। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता मुख्यमंत्री बन सकता है। अगर ऐसा होता है तो बिहार को पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री मिलेगा, क्योंकि हिंदी पट्टी के इस राज्य में अब तक भाजपा का कोई मुख्यमंत्री नहीं रहा है।
बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए 16 मार्च को चुनाव होने हैं। इन सीटों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि गुरुवार है। विधानसभा में मौजूद संख्याबल को देखते हुए नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए निर्वाचित होना लगभग तय माना जा रहा है।
हालांकि उनके इस फैसले के बाद जेडीयू के कुछ कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी देखने को मिली। गुरुवार सुबह से ही बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करते नजर आए। वे चाहते हैं कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री पद पर बने रहें।
जेडीयू नेता और राज्य सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष अलहाज मोहम्मद इरशादुल्लाह ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ता इस फैसले से खुश नहीं हैं। उनके अनुसार नीतीश कुमार का बिहार की राजनीति छोड़कर राज्यसभा जाना कार्यकर्ताओं के लिए चौंकाने वाला निर्णय है।
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज झा ने भी इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस घोषणा से ऐसा लगता है कि यह फैसला दिल्ली से आया है और जेडीयू का मूल आधार इससे आहत है।
इसी बीच दो दिन पहले जेडीयू नेताओं ने संकेत दिया था कि मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार जल्द ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं। ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा था कि पार्टी और राज्य के युवाओं की ओर से लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि निशांत कुमार राजनीति में आएं और जल्द ही इस संबंध में औपचारिक घोषणा की जाएगी।
राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि निशांत कुमार नई सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।
उधर, बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का दूरदर्शी नेतृत्व, सुशासन के प्रति प्रतिबद्धता और बिहार के सर्वांगीण विकास के लिए उनके प्रयास हमेशा प्रेरणादायी रहेंगे।
उन्होंने विश्वास जताया कि राज्यसभा में भी नीतीश कुमार का अनुभव और नेतृत्व सदन की गरिमा को और मजबूत करेगा।
बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से एनडीए के पास फिलहाल 202 विधायक हैं, जिनमें भाजपा के 89 और जेडीयू के 85 विधायक शामिल हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 41 विधायकों के प्रथम वरीयता वोट की जरूरत होती है। ऐसे में एनडीए के उम्मीदवारों की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है।