मध्य पूर्व में परमाणु संकट: IAEA प्रमुख की चेतावनी से दहली दुनिया

बड़े शहरों से भी विशाल क्षेत्रों को खाली कराने की नौबत

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पूनम शर्मा
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी सैन्य तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रोसी ने सोमवार को एक ऐसी चेतावनी दी है जिसने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि ईरान और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों में जारी सैन्य हमलों से परमाणु सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि बड़े शहरों से भी विशाल क्षेत्रों को खाली कराने की नौबत आ सकती है।

IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक को संबोधित करते हुए ग्रोसी ने बेहद गंभीर लहजे में कहा, “आज की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। हम किसी संभावित रेडियोधर्मी रिसाव की आशंका को खारिज नहीं कर सकते। ऐसी किसी भी घटना के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिसमें बड़े शहरों जितने या उससे भी बड़े क्षेत्रों को खाली कराने की आवश्यकता शामिल है।”

नातांज़ परमाणु परिसर पर हमले की पुष्टि

इस बीच ईरान के IAEA राजदूत रज़ा नजफी ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए सैन्य कार्रवाइयों के दौरान ईरान के नातांज़ परमाणु परिसर पर हमला किया गया। नजफी ने गुस्से भरे लहजे में कहा, “उन्होंने कल फिर से ईरान की शांतिपूर्ण और सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमला किया।” यह खुलासा इस पूरे संकट को एक नया आयाम देता है।

नातांज़ ईरान का सबसे महत्वपूर्ण परमाणु केंद्र है जहां यूरेनियम संवर्धन का काम होता है। इस सुविधा पर किसी भी तरह का हमला न केवल ईरान बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सुविधा को गंभीर नुकसान पहुंचता है तो इससे निकलने वाली रेडियोधर्मिता सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकती है।

मध्य पूर्व की परमाणु सुविधाएं खतरे में

यह समझना जरूरी है कि मध्य पूर्व में केवल ईरान ही नहीं, बल्कि कई देशों में परमाणु ऊर्जा और अनुसंधान सुविधाएं मौजूद हैं। संयुक्त अरब अमीरात चार पावर रिएक्टर संचालित करता है। जॉर्डन और सीरिया में अनुसंधान रिएक्टर हैं। इस क्षेत्र के कई अन्य देश नागरिक उद्देश्यों के लिए परमाणु सामग्री का उपयोग करते हैं। ऐसे में किसी भी परमाणु सुविधा पर हमले के सीमा पार परिणाम हो सकते हैं।

IAEA ने चेतावनी दी है कि ऐसे बुनियादी ढांचे को प्रभावित करने वाली किसी भी हड़ताल से सीमा पार के परिणाम हो सकते हैं। एजेंसी ने पूर्व के उन प्रस्तावों को याद दिलाया जो परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की निंदा करते हैं।

ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और उसके परिणाम

यह संकट तब और गहरा गया जब सप्ताहांत में अमेरिका और इज़राइल ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नामक एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत की खबर आई है। यह घटना मध्य पूर्व के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल देने वाली है।

जवाबी कार्रवाई में ईरान ने पश्चिम एशिया के कई देशों में अमेरिकी और इज़राइली ठिकानों पर हमलों की एक श्रृंखला शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार, दुबई हवाई अड्डे, कुवैत में एफ-15 लड़ाकू विमान और अरामको रिफाइनरी को निशाना बनाया गया। ये हमले दर्शाते हैं कि यह संघर्ष अब केवल ईरान-इज़राइल तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैल गया है।

वैश्विक बाज़ारों पर प्रभाव

इस संकट का असर वैश्विक बाज़ारों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। सोमवार की प्री-मार्केट ट्रेडिंग में अमेरिकी इक्विटी में गिरावट देखी गई। SPDR S&P 500 ETF जो S&P 500 इंडेक्स को ट्रैक करता है, 0.94% नीचे था। Invesco QQQ Trust ETF में 1.32% की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट और गहराता है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है, अब संघर्ष क्षेत्र बन गया है।

कूटनीति ही एकमात्र समाधान

IAEA प्रमुख ग्रोसी ने जोर देकर कहा है कि कूटनीति ही एकमात्र स्थायी रास्ता है। उन्होंने कहा, “हथियारबंद परमाणु सुविधाओं पर हमले से बचना चाहिए।” उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न करे और वैश्विक अप्रसार के विचार को बनाए रखा जाए, कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

हालांकि अभी तक ईरान की सीमा से लगे देशों में विकिरण के स्तर में कोई वृद्धि नहीं देखी गई है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है। परमाणु सुविधाओं पर किसी भी तरह का हमला मानवीय और पर्यावरणीय आपदा का कारण बन सकता है जिसके प्रभाव दशकों तक महसूस किए जा सकते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अब तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठनों को इस संकट को रोकने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह केवल मध्य पूर्व का नहीं बल्कि पूरी मानवता का सवाल है।

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