अरब और मुस्लिम देश ईरान का साथ क्यों नहीं देते ?

इज़राइल के खिलाफ एकजुट नहीं

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पूनम शर्मा
मध्य पूर्व की राजनीति एक जटिल पहेली की तरह है, जहां धर्म, राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय प्रभुत्व की लड़ाई लगातार चलती रहती है। हाल ही में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर इस क्षेत्र की विरोधाभासी वास्तविकताओं को उजागर कर दिया है।

जहां एक तरफ इज़राइल को वाशिंगटन से मजबूत राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक समर्थन मिलता है, वहीं दूसरी तरफ ईरान कई स्तरों पर अकेला दिखाई देता है। आश्चर्य की बात यह है कि प्रमुख अरब और मुस्लिम-बहुल देश भी तेहरान के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आते।

धार्मिक और जातीय विभाजन की गहरी खाई

ईरान और अरब देशों के बीच की दूरी की सबसे बड़ी वजह सांप्रदायिक और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता है। ईरान एक शिया-बहुल देश है, जहां शिया राजनीतिक विचारधारा पर आधारित धार्मिक नेतृत्व का शासन है। वहीं अधिकांश अरब देश सुन्नी-बहुल हैं।

यह केवल धार्मिक मतभेद का मामला नहीं है। ईरान फारसी है, अरब नहीं। यह जातीय और ऐतिहासिक अंतर सदियों पुरानी प्रतिस्पर्धा को और भी गहरा बनाता है। सऊदी अरब जैसे देश ईरान को एक धार्मिक प्रतिद्वंदी के रूप में देखते हैं जो इस्लामिक दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।

ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं: एक खतरे के रूप में

भले ही सीरिया, लेबनान और इराक में ईरान के सहयोगी हों, लेकिन सऊदी अरब, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश ईरान को मध्य पूर्व में अस्थिरता फैलाने वाली ताकत मानते हैं। ये देश ईरान पर यमन, सीरिया और इराक के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते हैं।

हिज़बुल्लाह और हमास जैसे संगठनों के साथ ईरान के संबंध भी पड़ोसी देशों के लिए चिंता का विषय हैं। प्रॉक्सी युद्ध और आंतरिक अशांति का डर इन देशों को ईरान से दूर रखता है। अरब देशों के लिए यह केवल इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष का मुद्दा नहीं है, बल्कि अपनी सत्ता और स्थिरता की सुरक्षा का सवाल है।

अमेरिका और इज़राइल के साथ गठबंधन

रणनीतिक गठबंधन इस परिदृश्य को और जटिल बनाते हैं। मिस्र, जॉर्डन, यूएई, बहरीन सहित कई अरब देशों के इज़राइल के साथ व्यावहारिक, कूटनीतिक या सुरक्षा संबंध हैं। ये रिश्ते अक्सर अमेरिकी हितों के अनुरूप होते हैं।

ये देश पैन-इस्लामिक एकजुटता की बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं। उनके लिए ईरान एक बड़ा खतरा है, इज़राइल नहीं। यह वास्तविकता धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठकर व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण है।

आर्थिक और भू-राजनीतिक कारक

15 सितंबर 2020 को हस्ताक्षरित अब्राहम समझौता एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यूएई और बहरीन जैसे देशों ने फिलिस्तीनी मुद्दे पर इज़राइल से सीधे टकराव की बजाय आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और रक्षा समन्वय को प्राथमिकता दी।

यह ईरान की स्थिति के विपरीत है, जो इज़राइल की वैधता को मान्यता देने से इनकार करता है। अरब देशों के लिए आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति, धार्मिक एकजुटता से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

“एक्सिस” का मुद्दा और प्रॉक्सी समूह

कई अरब सरकारें ईरान द्वारा हिज़बुल्लाह और हमास जैसे प्रॉक्सी समूहों के इस्तेमाल से डरती हैं या इसका विरोध करती हैं। हालांकि कई अरब नेता सार्वजनिक रूप से फिलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे ईरान के व्यापक क्षेत्रीय एजेंडे का समर्थन करते हैं।

निष्कर्ष

मध्य पूर्व की राजनीति में धर्म केवल एक कारक है, निर्णायक नहीं। राष्ट्रीय हित, सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता बताती है कि साझा धार्मिक पहचान के बावजूद अरब और मुस्लिम देश इज़राइल के खिलाफ ईरान के पीछे क्यों एकजुट नहीं होते।

यह वास्तविकता इस बात को रेखांकित करती है कि आधुनिक भू-राजनीति में व्यावहारिकता और राष्ट्रीय स्वार्थ, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों से अधिक प्रभावशाली हैं। मध्य पूर्व का भविष्य इसी जटिल समीकरण पर निर्भर करता है।

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