पूनम शर्मा
अली खामेनेई – यह नाम आज वैश्विक राजनीति में सबसे चर्चित और विवादास्पद नामों में से एक है। 86 वर्षीय खामेनेई की कहानी किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं है। एक धार्मिक छात्र जो कई बार जेल गया, बम धमाके में घायल हुआ, और अंततः ईरान की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंच गया।
प्रारंभिक जीवन और विद्रोह की शुरुआत
1939 में मशहद में जन्मे अली खामेनेई का संबंध एक कट्टर इस्लामी परिवार से था। बचपन से ही उन्होंने इस्लामी शिक्षा की राह चुनी और कोम में अध्ययन के दौरान आयतुल्लाह खुमैनी के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए।
1960 और 70 के दशक में जब ईरान पर शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, खामेनेई ने शाह के आधुनिकीकरण कार्यक्रमों और पश्चिमी नीतियों का खुला विरोध किया। उन्होंने खुमैनी के संदेशों का प्रचार किया और भाषण दिए, जिसके चलते 1963 से 1975 के बीच उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। जेल के इन अनुभवों ने उनकी छवि को एक निडर क्रांतिकारी के रूप में स्थापित किया।
1979 की इस्लामी क्रांति: महत्वपूर्ण मोड़
शाह शासन का पतन
1978 में जब देशव्यापी प्रदर्शन तेज़ हुए, खामेनेई सक्रिय रूप से आंदोलन का हिस्सा बने। जनवरी 1979 में शाह देश छोड़कर भाग गए और फरवरी में आयतुल्लाह खुमैनी की ईरान वापसी हुई। यह वह क्षण था जब जेल की कोठरी से निकला एक कार्यकर्ता सत्ता के गलियारों में दस्तक देने लगा।
नई व्यवस्था में उदय
क्रांति के बाद स्थापित नई इस्लामी व्यवस्था में खामेनेई को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। वे इस्लामी गणराज्य की क्रांतिकारी परिषद और संसद से जुड़े। 1980 के दशक की शुरुआत में जब ईरान-इराक युद्ध छिड़ा, तब देश को मजबूत नेतृत्व की जरूरत थी।
राष्ट्रपति से सुप्रीम लीडर तक
राष्ट्रपति काल (1981-1989)
1981 में राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई की हत्या के बाद खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति चुने गए। इसी वर्ष उन पर एक बम हमला भी हुआ जिसमें उनका दाहिना हाथ अपंग हो गया। इस घटना ने उनकी छवि को ‘क्रांति के रक्षक’ के रूप में और मजबूत किया।
दो कार्यकाल तक राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने युद्धकालीन प्रशासन और सुरक्षा मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि वास्तविक सर्वोच्च शक्ति खुमैनी के पास थी, लेकिन खामेनेई धीरे-धीरे सत्ता संरचना के भीतर एक विश्वसनीय नेता के रूप में स्थापित हो गए।
सर्वोच्च सत्ता की प्राप्ति
1989 में जब आयतुल्लाह खुमैनी का निधन हुआ, तो यह ईरान के लिए एक बड़ा राजनीतिक मोड़ था। विशेषज्ञों की सभा द्वारा नए सुप्रीम लीडर के चयन में खामेनेई की राजनीतिक अनुभव, सुरक्षा पृष्ठभूमि और संगठनात्मक क्षमता ने उनके पक्ष में माहौल बनाया। इस प्रकार वे ईरान के सुप्रीम लीडर बने।
अमेरिका और इस्राइल से टकराव
वैचारिक विरोध की जड़ें
खामेनेई के नेतृत्व में ईरान ने अमेरिका को “बड़ा शैतान” और इस्राइल को “अवैध राज्य” माना। उन्होंने फिलिस्तीनी समूहों और लेबनान के हिज़्बुल्लाह को समर्थन दिया, जिसे इस्राइल अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।
परमाणु कार्यक्रम विवाद
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और इस्राइल की आशंकाओं ने इस तनाव को और बढ़ाया। अमेरिका ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए और क्षेत्र में ईरान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की।
शासन शैली और प्रभाव
सुप्रीम लीडर बनने के बाद खामेनेई ने अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और सुरक्षा संस्थाओं के साथ करीबी संबंध बनाए। 2009 के ग्रीन मूवमेंट के दौरान उन्होंने बेहद सख्त रुख अपनाया।
निष्कर्ष
अली खामेनेई का सफर बताता है कि कैसे एक धार्मिक छात्र, जो कभी शाह की जेल में बंद था, क्रांति की लहर पर सवार होकर देश की सर्वोच्च सत्ता तक पहुंच गया। यह कहानी विचारधारा, राजनीतिक कौशल और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संयोग का एक असाधारण उदाहरण है। आज वे न केवल ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं, बल्कि विश्व के शिया मुसलमानों के सर्वोच्च धार्मिक नेता भी माने जाते हैं।