समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 28 फ़रवरी : Harvard University के दक्षिण एशियाई अध्ययन विभाग को अपने संस्कृत कार्यक्रम से जुड़ी एक सोशल मीडिया पोस्ट पर माफी मांगनी पड़ी है। विभाग ने स्वीकार किया कि पोस्ट में इस्तेमाल की गई एक छवि “संवेदनहीन” थी और इससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुईं।
शुक्रवार को जारी बयान में विभाग ने कहा कि उसे इस पोस्ट पर खेद है और वह अपने सोशल मीडिया से जुड़े आंतरिक प्रक्रियाओं की समीक्षा कर रहा है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पोस्ट Lakshmi Mittal and Family South Asia Institute से संबंधित नहीं थी, क्योंकि दोनों संस्थाएं विश्वविद्यालय के भीतर अलग-अलग इकाइयां हैं।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब संस्कृत के “एलीमेंट्री” कोर्स के प्रचार के लिए साझा की गई एक कलाकृति को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। उत्तरी अमेरिका के हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन Coalition of Hindus of North America (CoHNA) ने आरोप लगाया कि पोस्ट में प्रयुक्त चित्र संस्कृत और हिंदू परंपराओं को नकारात्मक रूप में दर्शाता है। संगठन ने इसे “हिंदूफोबिक” करार दिया।
सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के अनुसार, “मास्टर ऑफ पपेट्स” शीर्षक से साझा की गई यह कलाकृति भारतीय कलाकार अनिरुद्ध साइनाथ द्वारा बनाई गई थी। कुछ लोगों का दावा था कि इसमें महाभारत और भगवान कृष्ण की रासलीला जैसे प्रसंगों की प्रतीकात्मक झलक थी, जिसे कई लोगों ने आपत्तिजनक माना। CoHNA ने विभाग की माफी का स्वागत किया है। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय स्तर पर इस तरह की औपचारिक प्रतिक्रिया दुर्लभ है और यह संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा के प्रति सम्मान का संकेत है, जिसने सदियों तक दक्षिण एशिया की बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आकार दिया।
संस्कृत पर हार्वर्ड का रुख
हार्वर्ड अपने आधिकारिक विवरण में ‘क्लासिकल संस्कृत’ को ऐसी भाषा बताता है, जिसने लगभग तीन हजार वर्षों तक दक्षिण एशिया के बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित किया। इसे “देववाणी” भी कहा गया है, क्योंकि अनेक दार्शनिक, साहित्यिक और वैज्ञानिक ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए।
विश्वविद्यालय का दक्षिण एशियाई अध्ययन विभाग संस्कृत के प्रारंभिक, मध्यवर्ती और उन्नत स्तर के पाठ्यक्रम संचालित करता है। पाठ्यक्रम में Mahabharata और Ramayana जैसे महाकाव्यों के साथ-साथ दार्शनिक और साहित्यिक ग्रंथ भी शामिल हैं। शुरुआती कोर्स के विवरण में छात्रों को आश्वस्त किया गया है कि संस्कृत “जितनी कठिन समझी जाती है, उतनी नहीं है” और एक वर्ष के अध्ययन के बाद वे शब्दकोश की मदद से ग्रंथों को पढ़ सकेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शैक्षणिक संस्थानों को सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता के मामलों में कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि विभाग ने माफी मांगकर स्थिति को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन यह विवाद सोशल मीडिया के दौर में अकादमिक अभिव्यक्ति और सामुदायिक भावनाओं के बीच संतुलन की चुनौती को भी उजागर करता है।