पूनम शर्मा
भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे प्रभावशाली राजनीतिक मशीन खड़ी की है। कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी से लेकर डिजिटल आधारभूत संरचना तक—इसने शासन की कार्यक्षमता को एक नए स्तर पर पहुँचाया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या एक सक्षम मशीन अपने आप में पर्याप्त है? क्या केवल संगठन, चुनावी रणनीति और संचार कौशल किसी सभ्यतागत परिवर्तन का आधार बन सकते हैं?
मशीन चलती है, पर उसे ईंधन चाहिए। और वह ईंधन है—विचारधारा। यहाँ से हिंदुत्व आंदोलन की असली चुनौती शुरू होती है।
मशीन है, पर ‘ब्लूप्रिंट’ कहाँ है?
पिछले एक दशक में भाजपा ने जिस तरह कल्याणकारी योजनाओं को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer) और डिजिटल पहचान तंत्र से जोड़ा, वह प्रशासनिक दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि है। यह चुनावी रूप से भी प्रभावी साबित हुआ है। लेकिन अगर कोई आंदोलन केवल वितरण-तंत्र पर टिक जाए और उसके पीछे एक सुसंगत बौद्धिक ढांचा न हो, तो वह लंबे समय में दिशाहीन हो सकता है।
सभ्यतागत परिवर्तन केवल योजनाओं से नहीं आता, वह एक वैचारिक नक्शे से आता है—एक ऐसी रूपरेखा जो तय करे कि राष्ट्र क्या है, राज्य की भूमिका क्या है, धर्म और आधुनिकता का संबंध क्या है, और जब दो अच्छे विकल्पों में टकराव हो तो प्राथमिकता किसे दी जाए।
यहीं सबसे बड़ी चुप्पी दिखाई देती है।
भावनाएँ हैं, पर दार्शनिक स्पष्टता नहीं
हिंदुत्व आंदोलन के पास भावनात्मक ऊर्जा है। औपनिवेशिक विरासत की आलोचना है। ऐतिहासिक शिकायतों की सूची है। एक साझा ‘विरोधी’ भी है। लेकिन क्या उसके पास एक व्यवस्थित दार्शनिक संरचना है जो आधुनिक भारत के लिए स्पष्ट दिशा दे सके?
उदाहरण के लिए—आर्थिक नीति में क्या अंतिम लक्ष्य है? क्या यह राष्ट्रवाद आधारित पूंजीवाद है, कल्याणकारी राज्य है, या सांस्कृतिक समाजवाद? शिक्षा नीति में प्राथमिकता क्या है—वैश्विक प्रतिस्पर्धा या सांस्कृतिक पुनरुत्थान? विदेश नीति में व्यवहारिकता और वैचारिकता के बीच संतुलन कैसे तय होगा?
जब इन प्रश्नों के उत्तर परिस्थिति और प्रवक्ता के अनुसार बदलते दिखते हैं, तो यह संकेत है कि मूल ढांचा अभी तैयार नहीं है।
आईटी सेल बहस: लक्षण या बीमारी?
आलोचक अक्सर “आईटी सेल” को समस्या का केंद्र बताते हैं। सोशल मीडिया की आक्रामकता, ट्रोल संस्कृति, प्रतिक्रियात्मक बयानबाज़ी—इन सबको आंदोलन की कमजोरी के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन यह शायद केवल सतही विश्लेषण है।
संचार वही दोहराता है जो भीतर मौजूद है। यदि वैचारिक स्पष्टता होगी तो संदेश भी सुसंगत होगा। अगर भीतर अस्पष्टता है, तो बाहर विरोधाभास दिखाई देंगे। इसलिए समस्या तकनीक या संचार रणनीति की नहीं, बल्कि इनपुट की है।
“ यदि मूल विचारों का क्रमबद्ध निर्माण नहीं हुआ है, तो सबसे परिष्कृत संचार तंत्र भी भ्रम ही फैलाएगा।
सभ्यतागत परियोजना की चुनौती
हिंदुत्व स्वयं को केवल एक चुनावी आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत पुनरुत्थान की परियोजना के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसी परियोजना के लिए केवल संगठन और बहुमत पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए विचारकों, दार्शनिकों, नीति-निर्माताओं और सांस्कृतिक विश्लेषकों की एक दीर्घकालिक बौद्धिक परंपरा चाहिए।
इतिहास बताता है कि जिन आंदोलनों ने स्थायी परिवर्तन किए, उन्होंने पहले अपनी वैचारिक पुस्तक लिखी—शाब्दिक रूप से या बौद्धिक विमर्श के रूप में। उदारवाद, समाजवाद, यहाँ तक कि राष्ट्रवाद—इन सबके पीछे विस्तृत चिंतन और बहसों का इतिहास है।
क्या हिंदुत्व ने वह पुस्तक लिखी है? या वह अभी भी प्रतिक्रियात्मक विमर्श तक सीमित है?
आगे का रास्ता
यह संकट पराजय का संकेत नहीं है, बल्कि अवसर भी हो सकता है। यदि आंदोलन अपने भीतर बौद्धिक अनुशासन विकसित करे, प्राथमिकताओं को स्पष्ट करे और आधुनिकता व परंपरा के बीच एक सुविचारित संतुलन गढ़े, तो वह केवल चुनावी सफलता से आगे बढ़ सकता है।
अन्यथा, सबसे प्रभावशाली मशीन भी अंततः एक वितरण-तंत्र बनकर रह जाएगी—जिसके पास शक्ति तो होगी, पर दिशा नहीं।
सभ्यताएँ नारों से नहीं, विचारों से बदलती हैं। और विचारों को समय, धैर्य और आत्मालोचन की आवश्यकता होती है। शायद यही वह दोपहर है, जिसे अब तक टाल दिया गया था—डिज़ाइन पर विचार करने की दोपहर।