स्टालिन का मोदी पर वार, केंद्र-राज्य टकराव तेज

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पूनम शर्मा
तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय विमर्श के केंद्र में है। M. K. Stalin द्वारा यह बयान कि Narendra Modi चुनाव नजदीक आते ही तमिलनाडु के अधिक दौरे करेंगे और इससे एनडीए को नुकसान हो सकता है, केवल चुनावी टिप्पणी नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक संस्कृति की झलक है। यह परिघटना केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है; West Bengal, Punjab और अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों और केंद्र सरकार के बीच टकराव की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

उभरती राजनीतिक संस्कृति: प्रतिस्पर्धी संघवाद या टकराव?

भारत का संविधान संघीय ढांचे पर आधारित है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। लेकिन हाल के वर्षों में “सहकारी संघवाद” (Cooperative Federalism) की जगह “प्रतिस्पर्धी संघवाद” (Competitive Federalism) का स्वर अधिक मुखर हुआ है। कई क्षेत्रीय दल केंद्र की नीतियों को अपने राज्य की स्वायत्तता पर हस्तक्षेप के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का इतिहास लंबे समय से “राज्य अधिकार” और “केंद्र के हस्तक्षेप” के विरोध पर आधारित रहा है। ऐसे में जब भी केंद्र में मजबूत बहुमत वाली सरकार होती है, क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक पहचान को बचाने और सुदृढ़ करने के लिए अधिक मुखर रुख अपनाते हैं। स्टालिन का यह कहना कि “तमिलनाडु को फोर्ट सेंट जॉर्ज से चलाया जाना चाहिए, दिल्ली से नहीं” इसी भावनात्मक-राजनीतिक रेखा को पुष्ट करता है।

चुनावी रणनीति और पहचान की राजनीति

प्रधानमंत्री के बार-बार दौरे को “राजनीतिक” बताना दरअसल एक चुनावी रणनीति भी है। जब कोई राष्ट्रीय नेता किसी राज्य में सक्रिय होता है, तो क्षेत्रीय दल इसे बाहरी हस्तक्षेप के रूप में चित्रित कर अपने समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश करते हैं।

West Bengal में भी यही रणनीति देखी गई, जहाँ क्षेत्रीय नेतृत्व ने केंद्र के खिलाफ “बंगाल की अस्मिता” का मुद्दा उठाया। Punjab में कृषि कानूनों के दौरान केंद्र-राज्य संबंधों में तीखा टकराव देखने को मिला। तमिलनाडु में हिंदी भाषा, शिक्षा नीति, और केंद्रीय परीक्षाओं जैसे मुद्दे अक्सर क्षेत्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिए जाते हैं।

यह राजनीति मतदाताओं के बीच यह संदेश देती है कि क्षेत्रीय दल ही राज्य के हितों के सच्चे रक्षक हैं, जबकि केंद्र की सरकार बाहरी एजेंडा थोप रही है।

आर्थिक और नीतिगत असंतोष

स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीय बजट में तमिलनाडु के लिए कोई बड़ी घोषणा नहीं हुई, जबकि अन्य राज्यों के लिए परियोजनाएँ स्वीकृत की गईं। जब राज्यों को लगता है कि संसाधनों का वितरण असंतुलित है, तो असंतोष बढ़ता है।

जीएसटी मुआवजा, केंद्रीय करों में हिस्सेदारी, और परियोजनाओं की स्वीकृति जैसे मुद्दे अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं। क्षेत्रीय दल इन आर्थिक शिकायतों को राजनीतिक विमर्श में बदल देते हैं, जिससे केंद्र के प्रति अविश्वास की भावना गहरी होती है।

क्या यह लोकतांत्रिक संतुलन का हिस्सा है?

यह भी सच है कि एक मजबूत विपक्ष और मुखर राज्य सरकारें लोकतंत्र को संतुलित बनाती हैं। अगर सभी राज्य केंद्र की नीतियों को बिना प्रश्न स्वीकार कर लें, तो संघीय ढांचा कमजोर हो सकता है। इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच बहस और मतभेद स्वाभाविक हैं।

लेकिन जब यह मतभेद स्थायी टकराव या राजनीतिक शत्रुता में बदल जाते हैं, तो विकासात्मक समन्वय प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में केंद्र और राज्य के बीच तालमेल अत्यंत आवश्यक है।

समन्वय क्यों आवश्यक है?

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और सहयोग अनिवार्य है। नीति आयोग, अंतर-राज्य परिषद और जीएसटी परिषद जैसे मंच इसी उद्देश्य से बनाए गए हैं। यदि राजनीतिक मतभेद इन मंचों के प्रभाव को कम कर दें, तो राष्ट्रीय विकास की गति धीमी पड़ सकती है।

तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों की मजबूत सामाजिक जड़ें हैं। केंद्र सरकार के लिए भी यह आवश्यक है कि वह राज्यों की सांस्कृतिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं का सम्मान करे। वहीं, राज्यों को भी राष्ट्रीय नीतियों के व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझना चाहिए।

निष्कर्ष

एम.के. स्टालिन का बयान केवल एक चुनावी टिप्पणी नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जिसमें क्षेत्रीय दल अपनी पहचान को मजबूत करने के लिए केंद्र के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हैं। यह प्रवृत्ति संघवाद के स्वस्थ विमर्श का हिस्सा भी हो सकती है, लेकिन यदि यह निरंतर टकराव में बदल जाए तो राष्ट्रीय एकता और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संवाद और समन्वय में है। भारत की संघीय व्यवस्था तभी सफल होगी जब केंद्र और राज्य प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग की भावना भी बनाए रखें।

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