क्या बच्चों को न्यायपालिका की सच्चाई जानने का अधिकार नहीं?

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पूनम शर्मा
कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के संशोधित अध्याय 6 को लेकर देश में नया विवाद खड़ा हो गया है। National Council of Educational Research and Training (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के दूसरे संस्करण में न्यायपालिका से जुड़ी कुछ नई बातें जोड़ी गई थीं, जिनमें न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के कारण न्याय में देरी जैसी चुनौतियों का उल्लेख था।

बताया जा रहा है कि इन परिवर्तनों पर Supreme Court of India ने सवाल उठाए हैं। इसके बाद संशोधित संस्करण फिलहाल बाजार में उपलब्ध नहीं है। न तो यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिख रहा है और न ही पुस्तक विक्रेताओं के पास पहुंचा है। आधिकारिक रूप से इसे स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन बिक्री के लिए जारी नहीं किया गया है।

पहले और दूसरे संस्करण में क्या अंतर ?

पहले संस्करण में अध्याय 6 का मुख्य फोकस न्यायपालिका की संरचना, उसके अधिकार और ‘चेक्स एंड बैलेंस’ की अवधारणा पर था। इसमें बताया गया था कि अदालतें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे करती हैं और कानून के शासन को कैसे सुनिश्चित करती हैं।

लेकिन संशोधित दूसरे संस्करण में इससे आगे बढ़ते हुए न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया। इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों और देशभर में लंबित पड़े लाखों मामलों की वजह से होने वाली देरी को भी शामिल किया गया।

यही वे बिंदु हैं, जिन्होंने इस अध्याय को विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया। सवाल यह उठ रहा है कि क्या स्कूली बच्चों को न्यायपालिका की इन चुनौतियों के बारे में बताना उचित है या नहीं?

सच्चाई बताना गलत क्यों ?

लोकतंत्र की मजबूती केवल उसकी संस्थाओं की ताकत से नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता से भी तय होती है। अगर बच्चे देश के भविष्य हैं, तो क्या उन्हें केवल संस्थाओं का आदर्श स्वरूप ही दिखाया जाना चाहिए? क्या यह जरूरी नहीं कि वे यह भी जानें कि व्यवस्थाओं में सुधार की गुंजाइश कहां है?

न्यायपालिका देश की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। उसका सम्मान और स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन यह भी एक मानवीय संस्था है, जहां समस्याएं और चुनौतियां हो सकती हैं। लंबित मामलों की भारी संख्या कोई छिपी हुई बात नहीं है। अदालतों में वर्षों तक मुकदमे चलना आम नागरिक के अनुभव का हिस्सा है।

यदि पाठ्यपुस्तक में इन वास्तविकताओं का उल्लेख होता है, तो क्या यह न्यायपालिका की छवि धूमिल करना है या फिर छात्रों को एक संतुलित दृष्टिकोण देना?

जागरूकता से ही सुधार

किसी भी व्यवस्था में सुधार तभी संभव है जब उसकी कमियों को स्वीकार किया जाए। बच्चों को यह सिखाना कि न्यायपालिका केवल आदर्श है और उसमें कोई समस्या नहीं, क्या यह अधूरा सच नहीं होगा?

अगर छात्र यह जानेंगे कि न्याय में देरी भी एक गंभीर समस्या है, तो वे भविष्य में ऐसे नागरिक बन सकते हैं जो न्यायिक सुधार की मांग करें, प्रक्रियाओं को तेज और पारदर्शी बनाने की दिशा में सोचें।

शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि सोचने-समझने की क्षमता विकसित करना है। जब हम बच्चों से वास्तविक मुद्दों को छिपाते हैं, तो हम उनके विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को सीमित कर देते हैं।

संशोधित पुस्तक क्यों रोकी गई?

सूत्रों के अनुसार दूसरा संस्करण हाल ही में स्वीकृत हुआ था, लेकिन बाजार में जारी नहीं किया गया। फिलहाल पहला संस्करण ही उपलब्ध है। यह स्पष्ट नहीं है कि संशोधित सामग्री में और बदलाव होंगे या नहीं।

यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। क्या शैक्षणिक सामग्री में संस्थागत चुनौतियों का उल्लेख करना अनुचित है? या फिर यह लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत है कि हम अपने छात्रों को सच्चाई से परिचित कराएं?

छात्रों की पीढ़ी को पूरा चित्र चाहिए

आज की पीढ़ी सूचना के युग में जी रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से वे हर विषय पर जानकारी हासिल कर सकते हैं। ऐसे में पाठ्यपुस्तकों का दायित्व और बढ़ जाता है कि वे संतुलित, तथ्यात्मक और व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।

न्यायपालिका का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन उसकी चुनौतियों को समझना भी उतना ही जरूरी है। यदि बच्चे यह जानेंगे कि न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, तो वे एक अधिक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।

लोकतंत्र में पारदर्शिता कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत होती है। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि वह आने वाली पीढ़ियों को संस्थाओं के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि सूचित और जिम्मेदार दृष्टिकोण दे।

अब देखना यह है कि कक्षा 8 की यह संशोधित पुस्तक कब बाजार में आती है और क्या उसमें शामिल विवादित अंश यथावत रहते हैं या नहीं। लेकिन बहस ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या देश के बच्चों को न्यायपालिका की सच्चाई जानने का अधिकार है?

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