पूनम शर्मा
राष्ट्रीय चुनाव से पहले राजनीतिक हलकों में यह चर्चा थी कि जमात-ए-इस्लामी इस बार दशकों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती है। संगठनात्मक मजबूती, जमीनी नेटवर्क और सत्ता-विरोधी माहौल को देखते हुए पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही थी। लेकिन परिणाम घोषित होने के बाद साफ हो गया कि उम्मीदें वास्तविकता में तब्दील नहीं हो सकीं।
इस कमजोर प्रदर्शन के पीछे कई कारण रहे।
पहला, मुख्यधारा की पार्टियों का दबदबा। बड़े दलों ने चुनावी मैदान को इस तरह आकार दिया कि छोटे वैचारिक दलों के लिए जगह सीमित हो गई। कई सीटों पर रणनीतिक मतदान हुआ, जहां मतदाताओं ने उस उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जिसे जीतने की अधिक संभावना थी। इससे जमात के उम्मीदवारों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।
दूसरा, युवा और शहरी मतदाताओं के बीच सीमित स्वीकार्यता। पहली बार वोट देने वाले मतदाता रोजगार, तकनीकी विकास, आर्थिक स्थिरता और जीवन स्तर सुधार जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे। पार्टी का अभियान वैचारिक और पहचान आधारित मुद्दों पर केंद्रित रहा, जो बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप पर्याप्त नहीं माना गया।
तीसरा, ऐतिहासिक छवि की चुनौती। विरोधी दलों ने अतीत से जुड़े विवादों को बार-बार उठाया, जिससे मध्यम वर्ग और शिक्षित तबके में संदेह बना रहा। यह धारणा जमात के विस्तार में बाधा बनी।
नेतृत्व स्तर पर भी संतुलन की चुनौती सामने आई। पार्टी ने अपेक्षाकृत नरम छवि पेश करने की कोशिश की, लेकिन कोर समर्थकों और व्यावहारिक राजनीति के बीच तालमेल साधना आसान नहीं रहा। संदेश की स्पष्टता कई बार प्रभावित हुई।
चुनावी गणित भी अनुकूल नहीं रहा। कुछ क्षेत्रों में विपक्षी मतों का बंटवारा हुआ, जिससे प्रतिद्वंद्वियों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। प्रभावी प्री-पोल गठबंधन न होने से सीट साझेदारी में पार्टी की स्थिति कमजोर रही।
विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश का मतदाता अब अधिक विकासोन्मुख और व्यावहारिक हो चुका है। केवल वैचारिक प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं है; ठोस नीतिगत एजेंडा और आर्थिक दृष्टि भी जरूरी है।
चुनाव परिणाम के बाद पार्टी नेतृत्व ने आत्ममंथन का संकेत दिया है। भविष्य में संगठनात्मक सुधार, आधुनिक प्रचार रणनीति और व्यापक सामाजिक मुद्दों पर फोकस करने की चर्चा हो रही है।
यह चुनाव एक स्पष्ट संदेश देता है—परंपरागत आधार से बाहर निकले बिना और बदलती मतदाता प्राथमिकताओं को समझे बिना बड़े चुनावी विस्तार की राह आसान नहीं होगी।