कांग्रेस की रणनीति में बड़ा दांव: शशि थरूर को केरल अभियान की कमान

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम 13 फरवरी :  महीनों की खटपट और हालिया सुलह के बाद कांग्रेस ने केरल विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक मोर्चे पर बड़ा फैसला लिया है। वरिष्ठ नेता शशि थरूर  को पार्टी की केरल चुनाव अभियान समिति का सह-अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह कदम पार्टी के भीतर संदेश देता है कि नेतृत्व मतभेदों को पीछे छोड़कर चुनावी एकजुटता पर जोर दे रहा है।

नेतृत्व से सुलह के बाद मिली जिम्मेदारी

थरूर की नियुक्ति ऐसे वक्त हुई है जब उनकी मुलाकात कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से हुई थी। बैठक के बाद थरूर ने कहा था कि “सब ठीक है” और पार्टी नेतृत्व के साथ “हम एक ही पन्ने पर हैं।” इसके बाद उन्होंने लोकसभा में केंद्रीय बजट पर चर्चा की शुरुआत कर पार्टी लाइन का खुलकर बचाव भी किया।

विपक्षी मोर्चे पर कड़ा मुकाबला

कांग्रेस की तैयारी सत्तारूढ़  लेफ्ट डेमोक्रातिक फ्रंट  और भाजपा—दोनों को चुनौती देने की है। पिछले एक दशक से विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए यह चुनाव साख की परीक्षा माना जा रहा है। थरूर की राष्ट्रीय पहचान और शहरी-युवा मतदाताओं में लोकप्रियता को पार्टी रणनीतिक पूंजी मान रही है।

 थरूर की भूमिका और अभियान की दिशा

अभियान समिति के अध्यक्ष रमेश चेननिथल  के साथ सह-अध्यक्ष के तौर पर थरूर रणनीति निर्धारण, जनसंपर्क कार्यक्रमों के समन्वय और संदेश गढ़ने की जिम्मेदारी साझा करेंगे। केरल में  की जीत के लिए वे अग्रिम पंक्ति में रहकर अभियान चलाने की बात कह चुके हैं।

मतभेदों से मेल तक का सफर

हाल के महीनों में थरूर की कुछ टिप्पणियों—जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की प्रशंसा भी शामिल थी—को पार्टी लाइन से अलग माना गया। उन्होंने केरल में खुद को हाशिये पर डाले जाने और कोच्चि के एक कार्यक्रम में मिले व्यवहार पर असंतोष जताया था। अब सुलह के बाद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अहम जिम्मेदारी देकर संकेत दिया है कि संगठन अनुभव और लोकप्रियता—दोनों का उपयोग करेगा।

 क्यों अहम है यह नियुक्ति?
 शहरी और युवा मतदाताओं में कांग्रेस की पहुँच बढ़ाने का प्रयास
आंतरिक मतभेदों के बाद संगठनात्मक एकजुटता का संकेत
LDF और भाजपा—दोनों के खिलाफ संतुलित रणनीति
 अभियान के संदेश और जनसंपर्क को धार देने की कोशिश
निष्कर्ष:

केरल चुनाव से पहले कांग्रेस का यह फैसला केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है—पार्टी मतभेदों से ऊपर उठकर मैदान में उतरने को तैयार है। आने वाले महीनों में थरूर की सक्रियता तय करेगी कि यह दांव कांग्रेस को सत्ता की राह तक कितना करीब ले जाता है।

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