पूनम शर्मा
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर लगाए गए आरोपों ने राजनीतिक विमर्श को अचानक राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में ला खड़ा किया है। आरोप गंभीर हैं—पाकिस्तानी नागरिक से संबंध, संवेदनशील जानकारियों के संभावित संग्रह का संकेत, सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन और कथित वित्तीय लेनदेन। ऐसे आरोप केवल राजनीतिक विवाद नहीं रह जाते, बल्कि देश की सुरक्षा, संस्थागत विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़े प्रश्न खड़े करते हैं। इसलिए इस प्रकरण का मूल्यांकन भावनात्मक या दलगत दृष्टि से नहीं, बल्कि कानूनी, नैतिक और संवैधानिक कसौटी पर होना चाहिए।
आरोपों की प्रकृति और प्रमाण का मानक
मुख्यमंत्री द्वारा लगाए गए आरोपों का स्वरूप अत्यंत गंभीर है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों में “संभावना” या “आशंका” नहीं, बल्कि ठोस, सत्यापनीय और न्यायिक जाँच में टिकने योग्य प्रमाण अपेक्षित होते हैं। यदि किसी जनप्रतिनिधि या उनके परिजनों पर विदेशी नागरिक से संदिग्ध संबंध या वित्तीय लेनदेन का आरोप है, तो उसे सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत जाँच एजेंसियों के समक्ष प्रमाण सहित प्रस्तुत किया जाना चाहिए। एसआईटी द्वारा गृह मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपना प्रक्रियागत रूप से उचित कदम है, परंतु रिपोर्ट की सामग्री, जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सार्वजनिक भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
दूसरा प्रश्न: सुरक्षा प्रोटोकॉल उल्लंघन बनाम प्रक्रियात्मक तथ्य
अनधिकृत दौरे और सुरक्षा प्रोटोकॉल उल्लंघन के आरोप यदि सत्य हैं, तो यह एक प्रशासनिक-आपराधिक मुद्दा बनता है। परंतु ऐसे मामलों में तथ्यात्मक स्पष्टता आवश्यक है—कौन-सा प्रोटोकॉल, किस तिथि को, किस अनुमति के अभाव में, और किन जोखिमों के साथ उल्लंघन हुआ? राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर अस्पष्ट आरोप न केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित करते हैं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
वित्तीय लेनदेन और पारदर्शिता
पत्नी के कथित “पास-थ्रू” तंत्र के माध्यम से पाकिस्तान से वेतन मिलने का आरोप गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर संकेत करता है। परंतु इस दावे की पुष्टि के लिए बैंकिंग ट्रेल, अनुबंध, भुगतान स्रोत और कर/हलफनामे की जाँच आवश्यक है। चुनावी हलफनामे में किसी आय का उल्लेख न होना तभी अपराध बनता है जब वह आय कानूनी रूप से घोषित करने योग्य और सिद्ध हो। बिना दस्तावेजी प्रमाणों के ऐसे आरोप जनमत को प्रभावित करने का औजार बन सकते हैं।
प्रत्यारोप और राजनीतिक ध्रुवीकरण
गौरव गोगोई द्वारा आरोपों को “बेतुका और झूठा” बताना राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में समझा जा सकता है। लोकतंत्र में आरोपों का खंडन करना अधिकार है, परंतु बेहतर यह होगा कि वे भी तथ्यों और दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करें। इससे बहस आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर सत्यापन की ओर बढ़ेगी। राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों का उपयोग चुनावी या दलगत लाभ के लिए होना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।
संस्थागत प्रक्रिया और निष्पक्ष जाँच
एसआईटी की भूमिका तभी विश्वसनीय मानी जाएगी जब उसकी संरचना स्वतंत्र हो, कार्यप्रणाली पारदर्शी हो और निष्कर्ष न्यायिक समीक्षा के योग्य हों। गृह मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट पर आगे की कार्रवाई—जांच एजेंसियों की पड़ताल, आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक जांच—संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप होनी चाहिए। “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” का सिद्धांत लोकतंत्र का आधार है; मीडिया ट्रायल या राजनीतिक ट्रायल से बचना जरूरी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम राजनीतिक नैरेटिव
राष्ट्रीय सुरक्षा वास्तविक चिंता है, परंतु इसे राजनीतिक नैरेटिव में बदलना खतरनाक है। जब गंभीर आरोप सार्वजनिक मंचों पर बिना पर्याप्त प्रमाण के उछाले जाते हैं, तो इससे सुरक्षा एजेंसियों के कार्य में दबाव और भ्रम पैदा हो सकता है। बेहतर यह है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों को संस्थागत चैनलों से निपटाया जाए और सार्वजनिक संवाद संयमित रखा जाए।