ईरानी क्रांति में महिलाओं का अधूरा सपना: सत्ता बदली, लेकिन आज़ादी नहीं आई
तानाशाही के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी रहीं महिलाएँ, लेकिन इस्लामिक गणराज्य में उनकी आज़ादी सीमित होती चली गई
पूनम शर्मा
1979 की ईरानी क्रांति को अक्सर शाह के पतन और इस्लामिक गणराज्य की स्थापना के रूप में याद किया जाता है। इतिहास की किताबों में यह एक राजनीतिक परिवर्तन का अध्याय है। लेकिन इस क्रांति की एक ऐसी कहानी भी है, जो बार-बार अनदेखी रह जाती है—ईरान की महिलाओं की कहानी। वे महिलाएँ जिन्होंने क्रांति में कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया, जिन्होंने तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरकर आवाज़ उठाई, और जिन्होंने एक बेहतर, अधिक न्यायपूर्ण समाज का सपना देखा। पर आज, चार दशक बाद, वही महिलाएँ अपने ही सपनों के बोझ तले दबी दिखाई देती हैं।
शाह के दौर में बदलता समाज
शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन में ईरान पश्चिमी प्रभावों की ओर बढ़ रहा था। शिक्षा, स्वास्थ्य और कामकाज के अवसरों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही थी। यह सच है कि उस दौर में भी सब कुछ आदर्श नहीं था—राजनीतिक दमन, असमानताएँ और सत्ता का केंद्रीकरण लोगों को खटक रहा था। लेकिन क्रांति के समय महिलाओं की आकांक्षाएँ केवल शाह से मुक्ति तक सीमित नहीं थीं। वे एक ऐसे ईरान की कल्पना कर रही थीं जहाँ सम्मान, समानता और गरिमा उनके जीवन का हिस्सा बने।
जब मुद्दा कपड़े का नहीं, आज़ादी का था
क्रांति के शुरुआती दिनों में महिलाओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। कुछ ने हिजाब पहनकर विरोध जताया, कुछ ने बिना हिजाब के—क्योंकि उस समय मुद्दा कपड़े का नहीं, आज़ादी का था। सड़कों पर उठती आवाज़ें यह कह रही थीं कि सत्ता बदले, व्यवस्था बदले, और इंसान की गरिमा बहाल हो। परंतु सत्ता परिवर्तन के साथ ही धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि नई व्यवस्था महिलाओं की स्वतंत्रता को अपने ही तरीके से परिभाषित करने जा रही है।
नई सत्ता, नई पाबंदियाँ
इस्लामिक गणराज्य की स्थापना के बाद हिजाब अनिवार्य कर दिया गया। जो वस्त्र कभी व्यक्तिगत आस्था और चयन का विषय थे, वे राज्य के आदेश में बदल गए। कई महिलाओं के लिए यह केवल कपड़े की पाबंदी नहीं थी, बल्कि उनके शरीर, उनकी पहचान और उनकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण का प्रतीक बन गया। जो महिलाएँ क्रांति के दौरान बराबरी की उम्मीद लेकर आगे बढ़ी थीं, वे अब पीछे धकेली जाने लगीं—कानूनी अधिकारों में कटौती, सार्वजनिक जीवन में सीमाएँ और निजी निर्णयों पर पहरा।
सुलगता असंतोष और नई पीढ़ी
समय के साथ यह असंतोष सुलगता रहा। कभी विश्वविद्यालयों में, कभी कार्यस्थलों पर, और कभी सड़कों पर। महसा अमीनी की मृत्यु के बाद भड़के विरोध प्रदर्शनों ने दुनिया को फिर याद दिलाया कि ईरान की महिलाओं का संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। “ज़िंदगी, आज़ादी, महिला”—ये नारे केवल राजनीतिक विरोध नहीं थे, बल्कि एक पीढ़ी की पीड़ा और उम्मीदों की अभिव्यक्ति थे। बाल काटना, हिजाब उतारना, खुलेआम डर को चुनौती देना—ये छोटे-छोटे प्रतीक बन गए बड़े सवालों के।
आस्था बनाम आदेश की बहस
लेकिन इस संघर्ष को केवल पश्चिम बनाम इस्लाम के टकराव के रूप में देखना ईमानदार विश्लेषण नहीं होगा। ईरान की कई महिलाएँ आस्था को अपने जीवन का अहम हिस्सा मानती हैं और हिजाब को अपनी पहचान के रूप में अपनाती हैं। सवाल यह नहीं है कि हिजाब सही है या गलत। असली सवाल यह है कि क्या किसी स्त्री को अपने शरीर और जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार है या नहीं। जब चयन की स्वतंत्रता छीन ली जाती है, तब आस्था भी आदेश बन जाती है और आदेश दमन का रूप ले लेता है।
महिलाओं की स्थिति, समाज का आईना
ईरान की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि क्रांतियाँ अक्सर आदर्शों के नाम पर होती हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही आदर्श सबसे पहले कुचले जाते हैं। महिलाओं की स्थिति किसी भी समाज के नैतिक स्वास्थ्य का आईना होती है। जब उन्हें प्रतीक बनाकर नियंत्रित किया जाता है—कभी राष्ट्र की अस्मिता के नाम पर, कभी संस्कृति की रक्षा के नाम पर—तो दरअसल समाज अपनी असुरक्षाओं को उनके कंधों पर लाद देता है।
सवाल जो सत्ता को असहज करते हैं
आज ईरान की युवा पीढ़ी सवाल पूछ रही है। वे सोशल मीडिया पर, दीवारों पर लिखे नारों में, और सड़कों पर उठती आवाज़ों में यह पूछ रही है कि क्या आज़ादी केवल सत्ता बदलने का नाम है? क्या क्रांति का मतलब सिर्फ झंडे और नारे हैं, या इंसान की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सम्मान और विकल्प भी? इन सवालों के जवाब सत्ता के गलियारों में शायद असहज लगते हों, लेकिन यही सवाल किसी समाज को आगे बढ़ने का साहस देते हैं।
अधूरी कहानी, जिंदा सपने
ईरान की महिलाओं की कहानी अधूरी है—क्योंकि संघर्ष अभी जारी है। यह कहानी केवल पीड़ा की नहीं, साहस की भी है। उन महिलाओं की, जो डर के बीच भी खड़ी रहती हैं। जो जानती हैं कि हर छोटी असहमति, हर छोटा प्रतिरोध आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाता है। आज़ादी का सपना अभी पूरी तरह हकीकत नहीं बना है, लेकिन सपने जिंदा हैं—और जब तक सपने जिंदा हैं, इतिहास के पन्नों में बदलाव की संभावना भी रहती है।