अयोध्या : हम मंदिर को केवल ‘कमाई का जरिया’ मान बैठे हैं?

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पूनम शर्मा 

अयोध्या। सोशल मीडिया के दौर में आजकल हर त्योहार या बड़े आयोजन के बाद एक विशेष प्रकार का ‘डेटा’ तैरने लगता है। हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर को लेकर एक तुलनात्मक पोस्ट वायरल हुई, जिसमें इसे वेटिकन और मक्का से बड़ा ‘इकोनॉमिक हब’ (आर्थिक केंद्र) बताया गया। दावा किया गया कि अयोध्या ने दुनिया को ₹4 लाख करोड़ का जवाब दिया है। लेकिन क्या एक हिंदू के लिए मंदिर की भव्यता का पैमाना केवल ‘फुटफॉल’ (भीड़) और ‘रेवेन्यू’ (कमाई) होना चाहिए?

जब हम मंदिर को केवल आर्थिक चश्मे से देखते हैं, तो हम अनजाने में उसकी आध्यात्मिक और सभ्यतागत जड़ों को काट रहे होते हैं।

पर्यटन स्थल नहीं, ‘तीर्थ’ है अयोध्या

वायरल पोस्ट में गर्व के साथ बताया गया कि अयोध्या में साल 2024 में 16 करोड़ लोग आए, जो वेटिकन और मक्का की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। यहाँ समझने वाली बात यह है कि एक हिंदू ‘पर्यटक’ (Tourist) नहीं, बल्कि ‘भक्त’ या ‘तीर्थयात्री’ होता है।

पर्यटन मनोरंजन के लिए होता है, जबकि तीर्थयात्रा आत्म-साक्षात्कार और श्रद्धा के लिए। जब हम मंदिर की सफलता को भीड़ से नापते हैं, तो हम उसे एक ‘पिकनिक स्पॉट’ में बदल देते हैं। क्या हम किसी पवित्र नदी की महत्ता इस बात से तय करेंगे कि उसमें कितने लोग नहाए, या इस बात से कि उसने कितनी सदियों से एक सभ्यता को जीवित रखा?

₹4 लाख करोड़ की ‘मंदिर अर्थव्यवस्था’ का सच

Jefferies और SBI रिसर्च जैसी संस्थाओं ने मंदिर से होने वाली भारी टैक्स कमाई का जिक्र किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस पैसे से स्थानीय हिंदुओं और अयोध्या के मूल निवासियों के जीवन में कोई जमीनी बदलाव आया?

अक्सर विकास के नाम पर जमीन की कीमतें 900% तक बढ़ जाती हैं, जिससे स्थानीय लोग अपनी ही जमीन से बेदखल हो जाते हैं। कॉर्पोरेट समूह वहाँ 7-सितारा होटल बना रहे हैं, लेकिन क्या वे होटल अयोध्या की मर्यादा का पालन करेंगे? यदि वहाँ खान-पान और आचरण तीर्थ के अनुकूल नहीं रहा, तो वह बढ़ती कीमतें प्रगति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्षरण का संकेत हैं।

‘सॉफ्ट पावर’ का भ्रम

आजकल भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने के लिए ‘सॉफ्ट पावर’ शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। लेख में एक कड़वा सच सामने रखा गया है—दिसंबर 2025 में थाईलैंड ने कंबोडिया सीमा पर भगवान विष्णु की मूर्ति हटाकर बुद्ध की मूर्ति लगा दी। यदि सांस्कृतिक रूप से जुड़े पड़ोसी देशों में भी हमारे प्रतीकों का सम्मान सुरक्षित नहीं है, तो हमें अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ के दावों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। असली सांस्कृतिक प्रभाव प्रतीकों से नहीं, बल्कि एक संगठित और वैचारिक रूप से मजबूत समाज से आता है।

वायरल मैसेज कहता है कि जब आस्था और अर्थशास्त्र मिलते हैं, तभी ‘राम राज्य’ आता है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। राम राज्य का आधार ‘अर्थ’ (पैसा) नहीं, बल्कि ‘धर्म’ (नैतिकता और न्याय) है। राम राज्य मर्यादा, त्याग और जिम्मेदारी का नाम है, न कि केवल चमक-धमक और करोड़ों के टर्नओवर का।

ऐतिहासिक रूप से मंदिर हमेशा से समाज को खिलाते आए हैं। अन्नदान की परंपरा, शिक्षा के लिए पाठशालाएं और आयुर्वेद के केंद्र मंदिरों से ही संचालित होते थे। मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सभ्यता के ‘नर्व सेंटर’ थे।

तुलना की असुरक्षा

वेटिकन और मक्का से तुलना करना हमारी अपनी असुरक्षा को दर्शाता है। वेटिकन और मक्का में गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नहीं रह सकते, जबकि अयोध्या सबके लिए खुली है। ईसाई और इस्लामी दुनिया के पास एक केंद्रीय आवाज है, जबकि हिंदू समाज आज भी संगठित नहीं है। हमारी एकता आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता से आएगी।

 

निष्कर्ष: हमें यह समझने की जरूरत है कि मंदिर कोई सरकारी प्रोजेक्ट या मॉल नहीं है जिसे मुनाफे से तौला जाए। यदि हम मंदिर को सिर्फ रेवेन्यू का जरिया बनाएंगे, तो वह अपनी पवित्रता खो देगा। हमें ‘मंदिर’ और ‘टेंपल’, ‘भक्त’ और ‘टूरिस्ट’, ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ के बीच के बारीक अंतर को समझना होगा। अयोध्या की जीत केवल पत्थर के ढांचे में नहीं, बल्कि उस ‘मर्यादा’ के पुनरुत्थान में होनी चाहिए जिसके लिए प्रभु श्री राम जाने जाते हैं।

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