डॉ. कुमार राकेश
महाभारत के 18 दिनों के युद्ध को कोई नहीं भूल सकता। वह आज के कुरुक्षेत्र का रण क्षेत्र था, जो आजकल हरियाणा प्रांत का भाग है। वह एक यथार्थ है, सत्य है। कई प्रामाणिक तथ्यों और सत्यों पर आधारित है। उस महाभारत के युद्ध में राष्ट्र कल्याण है, तो मानव कल्याण भी। ‘सत्यमेव जयते’ का उद्घोष है, तो सत्य के रास्ते पर चलकर युद्ध की विजय भी। श्री राम की नीति है, तो श्री कृष्ण की कूटनीति भी। प्रेम है, तो द्वेष भी। घृणा है, तो उसका निराकरण भी। युद्ध की नीति है, तो व्यवस्थागत रीति भी। जिम्मेदारी है, तो उसे निर्वहन करने की अद्भुत चुनौती भी। आज के नए भारत के समाज, शासन, सरकार और राजनीतिक दलों के लिए इसमें कई संदेश निहित हैं।
तो आइए, आपको महाभारत युद्ध के एक उद्धरण से अपनी बात को आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। इन तमाम तथ्यों को आप आज के नए भारत के संपूर्ण परिदृश्य में देख सकते हैं, समझ सकते हैं; लेकिन पूर्वाग्रह से रहित होकर। सिर्फ साक्षी भाव से देखें, तो यह संदेश शायद सार्थक हो जाए।
महाभारत का युद्ध
18 दिनों के भीषण रक्तपात के बाद कुरुक्षेत्र का मैदान अब युद्धभूमि नहीं, श्मशान बन चुका था। जहाँ कल तक शंखनाद और तलवारों की खनखनाहट थी, आज वहाँ केवल मृत्यु का सन्नाटा गूँज रहा था। टूटे हुए रथ, हाथियों के शव और रक्त से सनी मिट्टी के बीच, कुरु वंश का वह अभिमानी, दंभी और गरूर से भरपूर युवराज दुर्योधन अपनी टूटी जंघाओं के साथ मृत्यु का इंतज़ार कर रहा था।
उसकी साँसें उखड़ रही थीं, लेकिन आँखों में पराजय की आग और हृदय में छल का आक्रोश अब भी धधक रहा था। ऐसा छल, आक्रोश और घृणा तब भी कम होती नहीं दिख रही थी। शायद यह उसका कर्म था, प्रारब्ध था। तभी वहाँ श्री कृष्ण का आगमन हुआ।
दंभी दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को देखते ही अपना सारा ज़हर उगलते हुए और गुस्से से काँपते हुए कहा— “तुमने छल से मुझे हराया है कृष्ण! यदि धर्म युद्ध होता, तो पांडव कभी नहीं जीतते!”
त्रिलोकीनाथ, अंतर्यामी, प्रेममय श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। दुर्योधन की दृष्टि उन पर टकटकी लगाए टिकी थी। परंतु श्री कृष्ण की मुस्कान में व्यंग्य या क्रोध नहीं, बल्कि करुणा, सत्य और निश्छल प्रेम था।
उन्होंने कहा— “दुर्योधन! तुम पांडवों के छल को देख रहे हो, लेकिन अपने चयन की भूल को नहीं। तुम्हारी हार गदाधर भीम की गदा से नहीं, बल्कि तुम्हारे एक गलत निर्णय से हुई है।”
एक ऐसा निर्णय, जो इतिहास बदल सकता था; एक नया इतिहास लिख सकता था। पूरे ब्रह्मांड को एक नई दृष्टि प्रदान कर सकता था। लेकिन जो नहीं होना था, नहीं हुआ। श्रीकृष्ण ने उस रहस्य से पर्दा उठाया, जिसने मरणासन्न दुर्योधन की रूह को कंपा दिया होगा।
श्रीकृष्ण बोले— “दुर्योधन, तुमने एक ग़लत चयन किया था। तुमने योग्यता की उपेक्षा कर अपनी मोह-माया में अपने लिए हानि का मार्ग चुना। तुम्हारी सेना में एक से एक योद्धा थे, लेकिन एक योद्धा ऐसा था जो साक्षात् काल था। यदि वह तुम्हारा सेनापति होता और तुम्हारा चयन सही होता, तो यह युद्ध 18 दिनों में नहीं, बल्कि एक प्रहर में ही समाप्त हो जाता। लेकिन तुमने उस हीरे को छोड़कर कंकड़-पत्थरों पर दांव लगाया। नतीजा तुम्हारे सामने है। क्या तुम्हें पता है वे योद्धा कोई और नहीं— गुरु द्रोणाचार्य के अजेय और अमर पुत्र अश्वत्थामा थे।”
अश्वत्थामा, जिसे दुर्योधन ने अपने मद में कभी समझा ही नहीं। कई मौके आए, कई शुभचिंतकों ने सुझाव दिया, लेकिन दुर्योधन ने अपने अहंकार और मोह में किसी की एक नहीं सुनी। दुर्योधन अपनी मित्र-मोह और भावनाओं में इतना अंधा था कि उसने कर्ण पर तो विश्वास किया, परंतु भगवान शिव के अवतार अश्वत्थामा को अनदेखा कर दिया।
18 दिनों के महायुद्ध का विश्लेषण
श्री कृष्ण ने कहा— “आरंभ के पहले से दस दिनों तक तुमने शांतनु पुत्र भीष्म को सेनापति बनाया, जो पांडवों से विशेष प्रेम करते थे। वह उन्हें मारना ही नहीं चाहते थे, लेकिन वह वचन और सिद्धांतवश तुम्हारे साथ थे, सिंहासन के साथ थे।”
“मध्य के ग्यारहवें से पंद्रहवें दिनों तक तुमने अपना सेनापति गुरु द्रोणाचार्य को नामित किया, जो शिष्य-मोह में बंधे थे। क्या तुम्हें पता है कि उस वक्त का तुम्हारा मुख्य शत्रु अर्जुन उनका सबसे प्रिय धनुर्धर था?”
“पंद्रहवें दिन के बाद जब गुरु द्रोणाचार्य आहत हुए, तब तुम्हें उस वक्त उनके अजेय-अमर पुत्र अश्वत्थामा को चुनना चाहिए था। उसका क्रोध पिता की मृत्यु के कारण चरम पर था, वह ‘रुद्र’ बन चुका था। लेकिन तब भी तुमने उस समय को नहीं पहचाना। तुमने अश्वत्थामा को सेनापति नहीं घोषित कर कर्ण को अपनी सेना की कमान सौंप दी। तुम्हारा वह निर्णय भावुकता से पूर्ण था, युद्ध की नीतियों के साथ नहीं था।”
“जहाँ तक कर्ण और अश्वत्थामा की तुलना की बात है, तो कर्ण वीर थे, दानवीर थे, लेकिन वह मरणशील थे—जबकि अश्वत्थामा अमर थे।”
श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा की शक्तियों का जो अप्रतिम वर्णन किया, वह सुनकर दुर्योधन सन्न रह गया। उसका दर्द पहले से दुगुना हो गया। वह अवाक् था। श्री कृष्ण ने बताया कि अश्वत्थामा में भगवान शिव का क्रोध और शक्ति समाहित थी। जहाँ कृपाचार्य 60,000 योद्धाओं से लड़ सकते थे, अश्वत्थामा अकेले 72,000 महारथियों को धूल चटाने की क्षमता रखते थे। अश्वत्थामा को ज्ञान केवल अपने पिता और गुरु द्रोण से नहीं, बल्कि परशुराम, व्यास और दुर्वासा जैसे ऋषियों और महाज्ञानियों से मिला था। धुरंधर अर्जुन के पास भी जिसका काट नहीं था, वह अस्त्र अश्वत्थामा के पास था।
श्री कृष्ण ने कहा— “दुर्योधन! यदि 16वें दिन सेनापति अश्वत्थामा होते, तो पांडव तो क्या, तीनों लोकों की शक्तियाँ भी उसे रोक नहीं पातीं।”
दुर्योधन को श्री कृष्ण की बातों का प्रमाण उसी रात मिल गया। जब वह मृत्युशैया पर अंतिम साँसें ले रहा था, उसने अश्वत्थामा को अपना अंतिम सेनापति घोषित किया। और फिर… अश्वत्थामा ने जो तांडव किया, वह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है। अकेले अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर वह कर दिखाया जो 11 अक्षौहिणी सेना 18 दिनों में न कर सकी—धृष्टद्युम्न का वध, शिखंडी और पाँचों उपपांडवों का संहार। पांडवों की शेष बची पूरी सेना को एक ही रात में गाजर-मूली की तरह काट दिया।
सुबह जब दुर्योधन को यह समाचार मिला, तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले। ये आँसू खुशी के नहीं, गहरे पछतावे के थे। उसके अंतिम शब्द मौन चीत्कार बन गए— “हाय! जिस शक्ति को मैं अंत में ढूँढ पाया, यदि उसे पहले पहचान लेता… तो आज कुरुक्षेत्र का विजेता मैं होता!”
लेकिन दुर्योधन के पास श्रीकृष्ण नहीं थे, क्योंकि उसने शुरुआती दौर में श्रीकृष्ण के शांति प्रस्ताव को भी पूर्ण अहंकार भाव से ठुकरा दिया था।
ज़रा सोचिए, आज के नए भारत में श्रीकृष्ण कौन है? दुर्योधन कौन? अर्जुन कौन? कौरव कौन? पांडव कौन? राष्ट्रवादी कौन? राष्ट्र के ख़िलाफ़ कौन?
इसीलिए कहा जाता है कि संसाधन होना ही काफी नहीं है, सही समय पर सही व्यक्ति की पहचान करना ही असली नेतृत्व है। आज की स्थिति में राष्ट्र को नए रूप में ढालना एक युद्ध से कम नहीं है। अक्सर हम भावनाओं या पूर्वाग्रहों में पड़कर जब कोई दल, संस्था या प्रतिष्ठान अपने सबसे काबिल विशेषज्ञों और योद्धाओं को नज़रअंदाज कर देते हैं, तो नुक़सान तो उठाना ही पड़ता है। वैसे, जब तक हमें उनकी कीमत और अहमियत समझ आती है… तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
आज की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में इस पूरे प्रकरण को समझा जा सकता है।
डॉ कुमार राकेश नई दिल्ली स्थित एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक हैं, जिन्हें मीडिया के क्षेत्र में लगभग 35 वर्षों का व्यापक अनुभव है। उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं और भारत के 9 टीवी समाचार चैनलों में बतौर निर्माता व प्रस्तुतकर्ता सक्रिय रहे हैं। पत्रकारिता के माध्यम से 50 से अधिक देशों की यात्रा कर चुके श्री राकेश ने अंतरराष्ट्रीय विषयों और भारतीय राजनीति पर गहराई से लिखा है, जिसके लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। वर्तमान में वे ‘ग्लोबल गवर्नेंस न्यूज ग्रुप’ और ‘समग्र भारत मीडिया ग्रुप‘ के संपादकीय अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
संदर्भ सार —
महाभारत के ‘शल्य पर्व’ और ‘सौप्तिक पर्व’ के प्रसंगों पर आधारित