आंध्र की राजनीति: आरोपों की आँच में झुलसता लोकतंत्र

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पूनम शर्मा 

आंध्र प्रदेश की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। हालिया घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव अब सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सड़कों पर उतरकर आम लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगा है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी द्वारा ‘जंगल राज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल और सरकार पर लगाए गए आरोप इस तनाव की तीव्रता को दिखाते हैं। सवाल यह नहीं है कि आरोप कौन लगा रहा है, बल्कि यह है कि इस राजनीतिक संघर्ष की कीमत जनता क्यों चुका रही है।

कानून-व्यवस्था पर सवाल और सत्ता की सख़्ती

वाईएसआरसीपी नेताओं के घरों पर हमलों, पोस्टरों के जरिए उकसावे और पुलिस की निष्क्रियता के आरोप राज्य की लोकतांत्रिक सेहत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अगर वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में भी पुलिस निष्क्रिय रही, तो यह सिर्फ़ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है।

लोकतंत्र में सत्ता का काम विरोध को कुचलना नहीं, बल्कि असहमति को सुनना होता है। नेताओं पर मुकदमे दर्ज करना, गिरफ्तारियाँ और डर का माहौल बनाना यह दर्शाता है कि सत्ता असहज है। मजबूत सरकार वही होती है जो सवालों से डरती नहीं, उनका सामना करती है।

शब्दों की ज़िम्मेदारी और राजनीति की मर्यादा

‘जंगल राज’ जैसे शब्द राजनीति में आग का काम करते हैं। ऐसे जुमले न सिर्फ़ टकराव बढ़ाते हैं, बल्कि समाज में भय और अविश्वास भी फैलाते हैं। जब शीर्ष नेता ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उसका असर ज़मीनी स्तर तक जाता है—और अक्सर हिंसा व उकसावे के रूप में सामने आता है।

तिरुपति जैसे आस्था के केंद्र से जुड़ा मुद्दा बेहद संवेदनशील है। इसे राजनीतिक हथियार बनाना दोनों पक्षों के लिए नैतिक चूक है। अगर जाँच रिपोर्ट सरकार के दावों से मेल नहीं खाती, तो उसे स्वीकार करने का साहस होना चाहिए। और अगर कहीं ग़लती हुई है, तो दोषियों पर कार्रवाई हो—पार्टी देखकर नहीं, सच्चाई देखकर।

आंध्र प्रदेश की जनता आज विकास, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दों पर ठोस काम चाहती है। उन्हें रोज़ की राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि स्थिरता चाहिए। लोकतंत्र सरकार और विपक्ष—दोनों से संतुलन की अपेक्षा करता है।

अब समय है कि आंध्र की राजनीति ठहरे, सोचे और ज़िम्मेदारी से बोले। वरना आरोपों की इस आग में न सच बचेगा, न भरोसा—और सबसे ज़्यादा नुकसान होगा आम जनता का।

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