ट्रंप के दावे, भारत की खामोशी: भारत-अमेरिका ट्रेड डील से जुड़े तीन सवाल जिन पर अब भी तस्वीर साफ़ नहीं
तेल आयात, 500 अरब डॉलर के व्यापार और टैरिफ शून्य करने के ट्रंप के दावों पर भारत सरकार की चुप्पी ने समझौते की शर्तों को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है।
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रूस से तेल ख़रीद को लेकर ट्रंप के बयान पर भारत की चुप्पी
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500 अरब डॉलर के अमेरिकी आयात के दावे पर सवाल
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ज़ीरो टैरिफ की बात से एमएसएमई और खेती में चिंता
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अंतिम समझौते का विवरण अब भी सार्वजनिक नहीं
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 04 फरवरी: सोमवार, 02 फरवरी को भारत और अमेरिका ने एक नए व्यापार समझौते की घोषणा की। बीते कुछ समय से दोनों देशों के संबंधों में आई तल्ख़ी के बीच इस समझौते को रिश्तों में सुधार की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
हालांकि अब तक न तो समझौते की शर्तें सार्वजनिक की गई हैं और न ही उसकी समयसीमा स्पष्ट की गई है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार शाम कहा कि अंतिम दौर की बातचीत में ब्योरे तय किए जा रहे हैं और सहमति बनते ही पूरी जानकारी साझा की जाएगी।
दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर समझौते को लेकर कई बड़े दावे कर दिए, जिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भारत सरकार की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई। इसी वजह से इस डील को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
पहला सवाल: क्या भारत रूस से तेल ख़रीदना बंद कर देगा?

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल ख़रीद रोकने और अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ाने पर सहमत हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत वेनेज़ुएला से तेल ख़रीद सकता है।
लेकिन भारतीय पक्ष की ओर से इन दावों की न तो पुष्टि की गई है और न ही खंडन।
अर्थशास्त्री बिस्वजीत धर का कहना है कि अमेरिका जहाँ खुलकर बोल रहा है, वहीं भारत सरकार पूरी तरह चुप है।
उनके मुताबिक़, भारत सरकार पहले साफ़ तौर पर कह चुकी है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा का निर्धारण स्वयं करेगी। अगर रूस से सस्ता तेल उपलब्ध है, तो वहीं से ख़रीद करना भारत का संप्रभु फ़ैसला है।
धर मानते हैं कि ट्रंप का यह दावा भारत के पहले के आधिकारिक रुख़ के बिल्कुल उलट है और यह संकेत देता है कि अमेरिका भारत को ऊर्जा नीति पर निर्देश देने की कोशिश कर रहा है।
धर यह भी कहते हैं कि जब तक भारत सरकार यह नहीं कहती कि ट्रंप का बयान सही नहीं है, तब तक राष्ट्रपति का सोशल मीडिया पोस्ट ही सच्चाई माना जाएगा।
पूर्व राजनयिक मोहन कुमार का कहना है कि पूरे समझौते का दस्तावेज़ सामने आए बिना इस मुद्दे पर टिप्पणी करना कठिन है।
उनके अनुसार, भारत पहले ही रूसी तेल की ख़रीद में कमी कर चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसने पूरी तरह से ख़रीद बंद करने का फ़ैसला कर लिया है।
दूसरा सवाल: क्या भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा?

ट्रंप के दावों का दूसरा बड़ा हिस्सा यह है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद खरीदेगा। हकीकत यह है कि भारत का मौजूदा वार्षिक अमेरिकी आयात 50 अरब डॉलर से भी कम है। ऐसे में इस स्तर तक पहुँचने में लंबा समय लग सकता है। प्रोफ़ेसर धर के अनुसार, इस दावे में सबसे संवेदनशील पहलू कृषि आयात का है।
प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त के भाषण में साफ़ कहा था कि किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इससे यह संदेश गया था कि अमेरिकी कृषि कंपनियों को भारतीय बाज़ार में खुली छूट नहीं मिलेगी।
धर का कहना है कि यह केवल किसानों की रोज़ी-रोटी का सवाल नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि साठ के दशक में भारत अमेरिकी खाद्यान्न आयात पर निर्भर था और उसी वजह से दबाव में था। आज आत्मनिर्भरता पर गर्व किया जाता है, लेकिन यह समझौता उस आत्मनिर्भरता पर असर डाल सकता है।
धर अमेरिकी कृषि सचिव के बयान का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि उन्होंने साफ़ कहा है कि भारत को निर्यात से अमेरिकी किसानों को बड़ा फ़ायदा होगा।
उनके मुताबिक़, यदि ऊर्जा और कृषि—दोनों बुनियादी क्षेत्रों में भारत आयात पर निर्भर हो गया, तो यह पहले लिए गए संप्रभु फ़ैसलों से पीछे हटना होगा।
हालांकि पीयूष गोयल ने कहा है कि ट्रेड डील में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है।
मोहन कुमार का कहना है कि 500 अरब डॉलर का आंकड़ा किस समयावधि के लिए है, यह समझना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि ट्रंप ने “गोइंग फॉरवर्ड” शब्द का इस्तेमाल किया है, जिससे संकेत मिलता है कि यह एक लंबी अवधि की योजना हो सकती है।
तीसरा सवाल: क्या भारत सभी टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं हटा देगा?
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर सभी टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं शून्य कर देगा।
भारत सरकार की ओर से इस पर अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक़, भारत पारंपरिक रूप से कृषि, जीएम खाद्य और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी आयात को लेकर सतर्क रहा है।
प्रोफ़ेसर धर कहते हैं कि पहले भारत का रुख़ यह था कि विकसित देशों पर अधिक और विकासशील देशों पर कम टैरिफ लगना चाहिए, लेकिन अब तस्वीर उलटी दिखाई दे रही है।
उनके अनुसार, अमेरिका में भारत पर टैरिफ बढ़कर 18 प्रतिशत हो चुके हैं, जबकि यदि भारत अपने टैरिफ शून्य करता है, तो यह असंतुलन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि इससे एमएसएमई सेक्टर को बड़ा झटका लग सकता है।
मोहन कुमार कहते हैं कि यहाँ दो सवाल अहम हैं—पहला, ट्रंप किन उत्पादों की बात कर रहे हैं, क्या सेवाएं भी इसमें शामिल हैं?
दूसरा, टैरिफ शून्य करने की समयसीमा क्या होगी—छह महीने, एक साल या कई वर्षों में? इन सवालों के जवाब समझौते की बारीक शर्तों में छिपे हैं।
निष्कर्ष: भू-राजनीतिक महत्व, लेकिन अस्पष्टता बरकरार
हालांकि दोनों विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है।
खास बात यह है कि यह डील यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते के तुरंत बाद सामने आई है।
लेकिन जब तक समझौते का पूरा दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं होता, तब तक ट्रंप के दावे और भारत की चुप्पी के बीच उठे ये तीन सवाल बने रहेंगे।