पूनम शर्मा
हाल के दिनों में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अपने बेबाक बयानों के कारण चर्चा के केंद्र में हैं। विशेष रूप से ‘मिया’ (पूर्वी बंगाल से आए मुस्लिम प्रवासियों) को लेकर उनके द्वारा दी गई टिप्पणियों ने न केवल देश के भीतर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई है, बल्कि इसकी गूँज सात समंदर पार संयुक्त राष्ट्र (UN) तक भी पहुँच गई है। यह विवाद तब गहरा गया जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री के बयान पर सवाल उठाना शुरू किया। लेकिन यहाँ बड़ा सवाल यह है कि क्या यह भारत के आंतरिक लोकतांत्रिक ढांचे में एक बाहरी हस्तक्षेप है?
‘मिया’ समुदाय और जनसांख्यिकीय परिवर्तन की चुनौती
असम की राजनीति और सामाजिक बनावट में ‘मिया’ शब्द उन मुसलमानों के लिए उपयोग किया जाता है जो मूल रूप से पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आकर यहाँ बसे हैं। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का तर्क है कि 2001 से 2014 के बीच लगभग 60 लाख से अधिक अवैध प्रवासी असम में दाखिल हुए, जिससे राज्य की कम से कम 27 विधानसभा सीटों का जनसांख्यिकीय स्वरूप पूरी तरह बदल गया है।
मुख्यमंत्री का कहना है कि ये लोग न केवल संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं, बल्कि असम की मूल संस्कृति और अनुसूचित जनजातियों (ST) के अधिकारों का भी हनन कर रहे हैं। उनके बयान, जिसमें उन्होंने आर्थिक बहिष्कार जैसी सख्त बातें कहीं, दरअसल उस गुस्से का प्रतीक हैं जो असम के मूल निवासियों में अपनी जमीन और पहचान खोने के डर से उपजा है। जब मूल निवासियों की जमीन हड़पी जा रही थी, तब वैश्विक संस्थाएं मौन थीं, लेकिन आज जब सुरक्षा की बात हो रही है, तो इसे मानवाधिकारों से जोड़ा जा रहा है।
विदेशी हस्तक्षेप और यूएन का दोहरा मापदंड
यह बेहद आश्चर्यजनक है कि जब अमेरिका अवैध प्रवासियों को हथकड़ियाँ लगाकर डिपोर्ट करता है, तब संयुक्त राष्ट्र की वैसी सक्रियता नहीं दिखती जैसी भारत के मामले में दिख रही है। भारत कोई छोटा देश या अस्थिर लोकतंत्र नहीं है जिसे बाहरी टूलकिट या विदेशी ताकतों द्वारा नियंत्रित किया जा सके। आलोचकों का मानना है कि ‘मिया’ मुसलमानों के प्रति भेदभाव का मुद्दा उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या यूएन ने तब सवाल उठाए थे जब असम के जनजातीय इलाकों में घुसपैठ के कारण हिंसा हुई थी? या जब मूल निवासियों को उनके ही घर में अल्पसंख्यक बना दिया गया? भारत की जनता अब जागरूक है और वह इसे सीआईए (CIA) जैसी संस्थाओं या विदेशी टूलकिट के प्रभाव में आकर अपनी संप्रभुता से समझौता करने के रूप में देखती है। यह स्पष्ट संदेश है कि भारत के चुनाव और यहाँ का भविष्य यहाँ की जनता तय करेगी, न कि सीमा पार से आए अवैध प्रवासी या उनके समर्थन में खड़ी विदेशी शक्तियां।
राष्ट्रवाद बनाम तुष्टीकरण: असम का भविष्य
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, मुख्यमंत्री के बयानों को केवल ‘मुसलमानों का अपमान’ बताकर वोट बैंक की राजनीति साधने की कोशिश कर रही है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर है। यह मुद्दा किसी धर्म विशेष का नहीं, बल्कि ‘अवैध बनाम वैध’ नागरिक का है। यदि कोई व्यक्ति बिना वीजा या कानूनी दस्तावेजों के देश में घुसकर यहाँ के लोकतांत्रिक सेटअप को बदलने का प्रयास करता है, तो उसे चुनौती देना किसी भी निर्वाचित सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है।
हिमंता बिस्वा सरमा जिस ‘इको सिस्टम’ को ध्वस्त करने की बात करते हैं, वह वही तंत्र है जिसने दशकों तक घुसपैठ को बढ़ावा दिया। आज जब एक मुख्यमंत्री राष्ट्रवाद की मशाल लेकर खड़ा है, तो उसे घेरने की कोशिशें तेज हो गई हैं। भारत को बांग्लादेश, नेपाल या श्रीलंका समझने की भूल भारी पड़ सकती है। अंततः, यह लड़ाई केवल असम की नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की सुरक्षा और सांस्कृतिक अखंडता की है। हमें यह तय करना होगा कि हम घुसपैठियों के साथ खड़े हैं या उस नेतृत्व के साथ जो भारत माता के आंचल की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।