संसद में राहुल गांधी : लोकतंत्र का सम्मान या करदाताओं के पैसे की बर्बादी ?

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पूनम शर्मा
संसद के बजट सत्र का पांचवां दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और हंगामेदार अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। जहां एक ओर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव और बजट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा होनी थी, वहीं विपक्षी नेता राहुल गांधी के व्यवहार ने सदन की गरिमा और कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चीनी घुसपैठ के पुराने और विवादित मुद्दों को बिना ठोस आधार के उठाने और नियमों की अनदेखी करने के कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई।

संसदीय समय का दुरुपयोग और करदाताओं की गाढ़ी कमाई का नुकसान

संसद का एक-एक मिनट देश के विकास के लिए अत्यंत कीमती होता है। सत्र के दौरान प्रति मिनट लाखों रुपये का खर्च आता है, जो सीधे तौर पर देश के करदाताओं (taxpayers) की जेब से जाता है। राहुल गांधी द्वारा सदन में किया गया हंगामा न केवल संसदीय समय की बर्बादी है, बल्कि उस जनता के साथ विश्वासघात भी है जो अपने प्रतिनिधियों से विकास और नीतियों पर सार्थक चर्चा की उम्मीद करती है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर होने वाली 16 घंटे की चर्चा में से आधे घंटे से अधिक का समय केवल राहुल गांधी के अड़ियल रवैये और असंसदीय व्यवहार के कारण नष्ट हो गया। जब सदन को बजट की बारीकियों और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटित 12 लाख करोड़ रुपये जैसे महत्वपूर्ण निवेश पर बात करनी चाहिए थी, तब राहुल गांधी एक ऐसी किताब का हवाला देने की कोशिश कर रहे थे जो अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित भी नहीं हुई है।

नियमों का उल्लंघन और स्पीकर की फटकार

सदन के भीतर राहुल गांधी का व्यवहार “एक बिगड़ैल शहजादे” की तरह देखा जा रहा है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपनी मर्जी से हांकना चाहते हैं। नियम 49 स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी उद्धरण (quote) को पेश करने के लिए उसका प्रासंगिक होना और नियमों के दायरे में होना अनिवार्य है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों ने जब राहुल गांधी को नियमों का पाठ पढ़ाना चाहा, तो उन्होंने सीखने के बजाय उपहासपूर्ण रवैया अपनाया।

स्पीकर द्वारा बार-बार समझाए जाने और ‘रूल बुक’ का हवाला दिए जाने के बावजूद, राहुल गांधी ने मर्यादा की सीमाएं लांघीं। उनका यह कहना कि “आप ही लिख कर दे दीजिए मैं वही पढ़ देता हूँ,” न केवल सदन के अध्यक्ष का अपमान है, बल्कि यह उनकी संसदीय प्रक्रियाओं के प्रति गंभीरता की कमी को भी दर्शाता है। पूर्व सेना प्रमुख के नाम का गलत उच्चारण और अपुष्ट लेखों के आधार पर प्रोपेगेंडा फैलाना उनकी अपरिपक्वता को उजागर करता है।

निलंबन की साजिश और ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का विलाप

विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह उकसावे वाला व्यवहार (provocative behavior) एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे जानबूझकर सदन में ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिससे स्पीकर को उनके खिलाफ सख्त कदम उठाना पड़े। यदि उन्हें सदन से निलंबित किया जाता है, तो वे बाहर जाकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने यह राग अलाप सकें कि “भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया है” या “विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है।”

यह विडंबना ही है कि जब देश की सेना डोकलाम जैसे मोर्चों पर बहादुरी से लड़ रही होती है, तब राहुल गांधी चीनी अधिकारियों के साथ नूडल्स खाते देखे जाते हैं, और अब सदन में चीनी एजेंडे को हवा देकर देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार की राजनीति न केवल संसद के समय की बर्बादी है, बल्कि यह देश की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।

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