भारत–कनाडा उर्वरक सहयोग को मिलेगी नई गति, पोटाश सुरक्षा पर बढ़ा फोकस
खाद्य सुरक्षा के लिए भारत–कनाडा रणनीतिक सहयोग को विस्तार
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भारत और कनाडा ने उर्वरक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई
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पोटाश आपूर्ति और निवेश को लेकर दीर्घकालिक रणनीति पर चर्चा
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भारत अपनी एमओपी जरूरतों का लगभग 25 प्रतिशत कनाडा से करता है आयात
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खनन, अन्वेषण और तकनीकी सहयोग के नए अवसरों पर सहमति
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 30 जनवरी:भारत और कनाडा ने उर्वरक क्षेत्र में आपसी सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय कनाडाई प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक कर दीर्घकालिक खाद्य और कृषि सुरक्षा के लिए रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा की।
पोटाश उपलब्धता को लेकर भारत की प्राथमिकता
बैठक के दौरान जेपी नड्डा ने कहा कि भारत में पोटाश की स्थिर और पर्याप्त उपलब्धता मृदा उर्वरता को सुदृढ़ करने तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) के भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में कनाडा की भूमिका भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
कनाडा से होता है 25 प्रतिशत एमओपी आयात
नड्डा ने जानकारी दी कि भारत अपनी कुल एमओपी उर्वरक आवश्यकताओं का लगभग 25 प्रतिशत कनाडा से आयात करता है। उन्होंने गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (जीएसएफसी) द्वारा कनाडा की पोटाश विकास कंपनी कार्नालाइट रिसोर्सेज इंक में किए गए 49.68 मिलियन कनाडाई डॉलर के निवेश का भी उल्लेख किया। वर्तमान में इस परियोजना में जीएसएफसी की 47.73 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिससे भारत को पोटाश क्षेत्र में रणनीतिक मजबूती मिली है।
कनाडा ने जताई कृषि सहयोग की प्रतिबद्धता
कनाडाई प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे प्राकृतिक संसाधन मंत्री टिम हौडसन ने भारत की कृषि उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग की कनाडा की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि पोटाश कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण खनिज है और कनाडा इस क्षेत्र में भारत का विश्वसनीय भागीदार बना रहेगा।
निवेश और तकनीकी सहयोग पर सहमति
हौडसन ने कनाडा के नए निवेश वातावरण की जानकारी देते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र में भारतीय निवेश के समान स्तर पर कनाडा सरकार भी निवेश के लिए तैयार है। दोनों पक्षों ने पोटाश सुरक्षा के लिए भारत की दीर्घकालिक रणनीति, खनन व अन्वेषण में तकनीकी सहयोग और एमओपी के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों पर भी विचार-विमर्श किया।