माघ मेले से बिना स्नान लौटे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद, विवाद ने पकड़ा राजनीतिक रंग
प्रशासनिक रोक से नाराज़ शंकराचार्य, 10 दिन का धरना समाप्त
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मौनी अमावस्या पर संगम स्नान को लेकर पुलिस और अनुयायियों में हुआ विवाद
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18 जनवरी से 28 जनवरी तक धरने पर बैठे रहे शंकराचार्य
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नोटिस, उपाधि विवाद और राजनीतिक बयानबाज़ी से मामला और बढ़ा
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संत समाज और राजनीतिक दलों में मतभेद खुलकर सामने आए
समग्र समाचार सेवा
प्रयागराज | 28 जनवरी: प्रयागराज में आयोजित माघ मेला इस बार धार्मिक आस्था से अधिक प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद को लेकर चर्चा में रहा। उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ के प्रमुख शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 28 जनवरी को घोषणा की कि वह इस माघ मेले में संगम स्नान नहीं करेंगे और भारी मन से प्रयागराज छोड़ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब कोई शंकराचार्य बिना स्नान किए माघ मेला छोड़ने को विवश हुआ है।
18 जनवरी से धरने पर बैठे थे शंकराचार्य
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर संगम में स्नान के लिए पहुँचे थे। आरोप है कि उस दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रथ के साथ आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद प्रशासन और उनके अनुयायियों के बीच विवाद हो गया। शंकराचार्य उसी दिन से धरने पर बैठ गए और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करने लगे।
मौनी अमावस्या के दिन क्या हुआ
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अपने रथ और लगभग 200 अनुयायियों के साथ त्रिवेणी संगम की ओर जा रहे थे। इसी दौरान पुलिस अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए रथ को आगे जाने से रोक दिया। इस पर पुलिस और अनुयायियों के बीच
बहस और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी।
शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि उन्हें संगम स्नान से रोका गया और पुलिसकर्मियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों की तस्वीरें भी मीडिया को दिखाई और कहा कि यह घटना प्रयागराज की मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल की मौजूदगी में हुई।
प्रशासन की सफाई
घटना के बाद मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल, जिलाधिकारी मनीष वर्मा और पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार ने संयुक्त प्रेस वार्ता की।
मंडलायुक्त ने कहा कि सुबह एक से दस बजे के बीच संगम क्षेत्र में अत्यधिक भीड़ और घना कोहरा था, ऐसे में रथ के साथ प्रवेश सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक हो सकता था। उन्होंने बताया कि शंकराचार्य से पालकी से उतरकर पैदल जाने का अनुरोध किया गया था, लेकिन इसी दौरान उनके अनुयायियों और पुलिस के बीच विवाद बढ़ गया। प्रशासन के अनुसार, इस दौरान बैरिकेड्स को भी नुकसान पहुँचा।
नोटिस और उपाधि को लेकर नया विवाद
मेला प्राधिकरण ने शंकराचार्य को नोटिस जारी कर कहा कि 18 जनवरी को उनके और उनके समर्थकों द्वारा जबरन संगम में प्रवेश करने का प्रयास किया गया, जिससे भगदड़ की स्थिति बन सकती थी। नोटिस में उनसे यह भी पूछा गया कि भविष्य में मेलों में भाग लेने से उन्हें क्यों न रोका जाए।
इसके बाद एक अन्य नोटिस में 2022 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए उनके द्वारा “शंकराचार्य” उपाधि के उपयोग पर सवाल उठाया गया, जिससे विवाद और गहरा गया।
शंकराचार्य की प्रतिक्रिया
इस पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह तय करने का अधिकार न तो प्रशासन को है, न मुख्यमंत्री को और न ही राष्ट्रपति को कि कौन शंकराचार्य है। उन्होंने इसे धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप बताया।
राजनीतिक रंग और नेताओं की एंट्री
मामला राजनीतिक रूप से तब तूल पकड़ गया जब समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट कर भारतीय जनता पार्टी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी द्वारा शंकराचार्य से प्रमाण मांगा जाता है तो यह सनातन धर्म का गंभीर अपमान है।
कांग्रेस नेताओं ने भी शंकराचार्य से मुलाकात कर समर्थन जताया, जबकि पिछले वर्ष यही शंकराचार्य राहुल गांधी के बहिष्कार की बात कह चुके थे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी बयान जारी कर कहा कि प्रशासन द्वारा शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगना अधिकारों और मर्यादाओं का उल्लंघन है।
उपमुख्यमंत्री की अपील, मुख्यमंत्री का बयान
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य से संगम स्नान करने की अपील करते हुए कहा कि वह उनके चरणों में प्रणाम करते हैं और चाहते हैं कि इस विषय का शांतिपूर्ण समाधान हो।
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरियाणा के सोनीपत में एक कार्यक्रम के दौरान बिना नाम लिए “कालनेमि” शब्द का प्रयोग किया। इस पर शंकराचार्य ने पलटवार करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए, धर्म-अधर्म का निर्णय धर्माचार्यों पर छोड़ देना चाहिए।
संत समाज में मतभेद
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने प्रशासन का समर्थन करते हुए कहा कि नियमों के अनुसार रथ से गंगा तक नहीं जाया जाता और शंकराचार्य के साथ अन्याय नहीं हुआ।
दूसरी ओर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन करते हुए कहा कि तीन शंकराचार्य उनके साथ हैं और प्रशासन द्वारा प्रमाण मांगना गलत है।
मुलाक़ातें और विश्लेषण
27 जनवरी को कंप्यूटर बाबा और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला ने प्रयागराज पहुंचकर शंकराचार्य से मुलाकात की।
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस का कहना है कि उपमुख्यमंत्री का बयान पार्टी हाईकमान की लाइन दर्शाता है, जबकि जिला प्रशासन का रुख राज्य सरकार की सोच को दिखाता है। उनके अनुसार, इस मामले में सत्तारूढ़ दल असहज स्थिति में नजर आ रहा है।