यूजीसी के नए नियमों पर सियासी घमासान, बीजेपी के भीतर भी विरोध क्यों नहीं हो रहा ख़त्म?
यूजीसी के नए नियमन पर सड़क से संसद तक विरोध, सुप्रीम कोर्ट पहुँचा मामला
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यूजीसी के नए नियमों को लेकर छात्रों, संगठनों और राजनीतिक दलों में तीखी प्रतिक्रिया
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बीजेपी के भीतर भी विरोध, कुछ पदाधिकारियों ने दिए इस्तीफ़े
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दुरुपयोग की आशंका बनाम सामाजिक न्याय की दलील
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मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, अंतिम फ़ैसले पर टिकी निगाहें
समग्र समाचार सेवा
लखनऊ। 28 जनवरी: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को यूजीसी विनियम 2026 अधिसूचित किए। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और सभी वर्गों के लिए समान वातावरण सुनिश्चित करना बताया गया है।
नए नियमन के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में समता समिति के गठन का प्रावधान है। इस समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जाँच करेगी और रिपोर्ट देगी।
क्यों भड़क रहा है विरोध
नियमों के विरोध में सामने आ रहे समूहों का कहना है कि इन प्रावधानों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों पर झूठे आरोप लगने की आशंका बढ़ सकती है, जिससे उनका शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य प्रभावित हो सकता है।
इसी आशंका के चलते उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, संभल, कुशीनगर सहित कई ज़िलों में छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए। अलीगढ़ में एक प्रदर्शन के दौरान बीजेपी सांसद के काफ़िले को रोके जाने और यूजीसी का पुतला फूंके जाने की घटनाएँ भी सामने आईं।
बीजेपी के अंदर भी असंतोष
यह मुद्दा अब सिर्फ़ विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। बीजेपी के भीतर भी ज़मीनी स्तर पर असंतोष दिख रहा है। रायबरेली में किसान मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने नए नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
हालाँकि पार्टी नेतृत्व का एक वर्ग नियमों का बचाव कर रहा है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का कहना है कि यह नियमन संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप है और यह सभी वर्गों पर समान रूप से लागू होगा।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे समाज को बाँटने वाला क़दम बताया है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का आरोप है कि सरकार पहले धर्म के आधार पर और अब जाति के आधार पर समाज में विभाजन कर रही है।
शिवसेना (उद्धव गुट) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने नियमों को “जजमेंटल” बताते हुए कहा कि इससे कैंपस में नया भेदभाव पैदा हो सकता है और झूठे मामलों की स्थिति में न्याय कैसे सुनिश्चित होगा, यह स्पष्ट नहीं है।
समर्थन में भी मज़बूत आवाज़ें
वहीं, आज़ाद समाज पार्टी के नेता और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने इन नियमों का समर्थन करते हुए कहा कि जब आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को भी शामिल किया गया है, तो इसे किसी एक वर्ग के ख़िलाफ़ बताना ग़लत है।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने भी कहा कि इस पर हो रही प्रतिक्रिया में “उच्च जातीय प्रतिक्रिया” की झलक मिलती है, हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि नियमों में कुछ कमियाँ हैं, जिन पर न्यायालय को विचार करना चाहिए।
शिक्षा मंत्री का आश्वासन
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने साफ़ किया है कि भेदभाव के नाम पर किसी को परेशान नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इन नियमों का दुरुपयोग रोकना सरकार, यूजीसी और राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी होगी और पूरी प्रक्रिया संविधान के दायरे में रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
अधिवक्ता विनीत जिंदल ने यूजीसी नियमों के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि जाति आधारित भेदभाव किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है, इसलिए क़ानून की नज़र में सभी की समानता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आगे क्या
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचने के बाद कई राजनीतिक दल खुलकर बयान देने से बचते नज़र आ रहे हैं। अब सबकी निगाहें न्यायालय के फ़ैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि यूजीसी का यह क़दम सामाजिक न्याय की दिशा में सुधार है या नए विवाद की वजह।