शिक्षा नीति पर असंतोष: नए नियमों के विरोध में सत्तारूढ़ दल के 11 पदाधिकारियों ने छोड़ा पद
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रावधानों को लेकर संगठन के भीतर उभरा असंतोष, लखनऊ में सामूहिक त्यागपत्र
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लखनऊ के कुम्हरावां मंडल में 11 पदाधिकारियों का सामूहिक इस्तीफ़ा
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नए शैक्षणिक नियमों को बताया वैचारिक मूल्यों के विरुद्ध
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मंडल महामंत्री अंकित तिवारी ने नेतृत्व पर लगाए गंभीर आरोप
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शिक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज
समग्र समाचार सेवा
लखनऊ | 27 जनवरी: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए नए शैक्षणिक नियमों को लेकर शुरू हुआ विरोध अब राजनीतिक हलकों तक पहुँच गया है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी को उस समय बड़ा झटका लगा, जब कुम्हरावां मंडल के 11 पदाधिकारियों ने सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया।
अंकित तिवारी के नेतृत्व में सामूहिक त्यागपत्र
कुम्हरावां मंडल के मंडल महामंत्री अंकित तिवारी ने जिला अध्यक्ष को संबोधित पत्र में कहा कि नए नियमों को लागू करने का निर्णय पार्टी की मूल विचारधारा के विपरीत है। उनके साथ मंडल के अन्य दस पदाधिकारियों ने भी संगठनात्मक दायित्वों से स्वयं को अलग कर लिया।
नियमों को बताया भविष्य के लिए घातक
अंकित तिवारी ने अपने त्यागपत्र में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए प्रावधानों को पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व की ओर से की गई विनाशकारी कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे निर्णयों से संगठन की वैचारिक दिशा कमजोर हो रही है और आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
प्रेरणा स्रोतों से भटकने का आरोप
इस्तीफ़ा देने वाले पदाधिकारियों का कहना है कि पार्टी अपने प्रेरणा पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सिद्धांतों से दूर होती जा रही है। अंकित तिवारी ने स्पष्ट किया कि वह अब पार्टी के किसी भी कार्यक्रम या गतिविधि में भाग नहीं लेंगे।
नए शैक्षणिक नियमों का उद्देश्य क्या है?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 15 जनवरी 2026 से देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नए नियम लागू किए हैं। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है। ये प्रावधान वर्ष 2012 के पुराने नियमों का स्थान लेंगे।
हर संस्थान में बनेगा समानता प्रकोष्ठ
नए नियमों के अनुसार, प्रत्येक सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थान में समानता प्रकोष्ठ का गठन अनिवार्य होगा, जहाँ छात्र भेदभाव से संबंधित शिकायत दर्ज करा सकेंगे और संस्थान को उस पर कार्रवाई करनी होगी।
विवाद की वजह क्या है?
अन्य पिछड़ा वर्ग को शामिल करने पर असहमति
नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल किया गया है। इसे लेकर कुछ वर्गों का मानना है कि इससे पहले से मौजूद व्यवस्थाओं में असंतुलन पैदा हो सकता है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल
विरोध करने वालों का तर्क है कि देश के विश्वविद्यालय पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ रहे हैं। ऐसे में नियमों की संख्या बढ़ाने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए।
गलत शिकायतों की आशंका
छात्रों और शिक्षकों के एक वर्ग को डर है कि नए प्रावधानों का दुरुपयोग कर झूठी शिकायतें की जा सकती हैं, जिससे किसी का शैक्षणिक भविष्य और करियर प्रभावित हो सकता है।