पूनम शर्मा
केरल के सबरीमला मंदिर से जुड़ा कथित स्वर्ण चोरी मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। विशेष जाँच दल (SIT) ने अपनी जाँच का दायरा बढ़ाते हुए अब पूर्ववर्ती कांग्रेस और CPI(M) शासनकाल के दौरान बने मंदिर प्रबंधन बोर्डों तक जाँच पहुँचा दी है। इस नए चरण में खास तौर पर द्वज स्तंभम (ध्वज स्तंभ) के प्रतिस्थापन और घी (घृत) की खरीद से जुड़े मामलों को फिर से खंगाला जा रहा है।
सबरीमला केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में मंदिर से जुड़े किसी भी वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता के आरोप का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी गहराई से प्रभावित करता है।
द्वज स्तंभम मामला: सवालों के घेरे में सोने का उपयोग
SIT की जाँच का प्रमुख बिंदु द्वज स्तंभम का प्रतिस्थापन है, जिसे लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि इस परियोजना में जितनी मात्रा में सोने के उपयोग की बात कही गई थी, वास्तविकता में वह उससे कम थी। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि स्वीकृत सोने की मात्रा, खरीदे गए सोने और वास्तविक निर्माण में इस्तेमाल सोने के बीच कोई अंतर तो नहीं था।
सूत्रों के अनुसार, SIT पुराने रिकॉर्ड, टेंडर दस्तावेज़, भुगतान विवरण और निर्माण से जुड़े तकनीकी आकलनों की दोबारा जांच कर रही है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि उस समय मंदिर प्रशासन और देवस्वम बोर्ड के सदस्यों की भूमिका क्या थी और निर्णय प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी।
घी की खरीद: एक पुराना मामला, नई जाँच
द्वज स्तंभम के साथ-साथ घी की खरीद से जुड़ा मामला भी फिर से फोकस में आ गया है। सबरीमला में प्रसाद और अनुष्ठानों के लिए घी की बड़ी मात्रा में खरीद होती है। पहले आरोप लगे थे कि इस खरीद में गुणवत्ता मानकों की अनदेखी की गई और कीमतों में भी गड़बड़ी हुई।
अब SIT यह जांच कर रही है कि क्या घी की आपूर्ति में ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुँचाया गया और क्या इसके पीछे किसी तरह का राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव था। पुराने सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स, भुगतान रिकॉर्ड और गुणवत्ता रिपोर्ट्स को फिर से खंगाला जा रहा है।
राजनीति और आस्था का टकराव
जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ रही है, राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज होती जा रही हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि जांच को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि जांच एजेंसियों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल तथ्यों तक पहुंचना है।
कांग्रेस और CPI(M) से जुड़े पूर्व देवस्वम बोर्ड सदस्यों के नाम सामने आने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है। दोनों दलों का कहना है कि उनके कार्यकाल में सभी फैसले नियमों और परंपराओं के अनुसार लिए गए थे और किसी भी तरह की अनियमितता के आरोप बेबुनियाद हैं।
हालांकि, श्रद्धालुओं के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि अगर सब कुछ सही था, तो बार-बार जांच की जरूरत क्यों पड़ रही है?
देवस्वम बोर्ड की भूमिका पर सवाल
सबरीमला मंदिर का प्रशासन त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड के अधीन आता है। SIT की जांच अब बोर्ड की कार्यप्रणाली, आंतरिक ऑडिट और निगरानी तंत्र पर भी केंद्रित हो रही है। यह देखा जा रहा है कि क्या बोर्ड के भीतर पर्याप्त नियंत्रण और पारदर्शिता थी, या फिर निर्णय कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रह गए थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक संस्थानों का प्रशासन केवल परंपरा और आस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जब करोड़ों रुपये का चढ़ावा और संपत्ति जुड़ी हो, तो जवाबदेही और पारदर्शिता अनिवार्य हो जाती है।
जाँच का सामाजिक असर
इस पूरे मामले का असर सिर्फ कानूनी या राजनीतिक नहीं है। आम श्रद्धालुओं के मन में असहजता और निराशा भी देखी जा रही है। जिन स्थानों को पवित्र और निष्कलंक माना जाता है, उनसे जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप लोगों के विश्वास को चोट पहुंचाते हैं।
कई श्रद्धालुओं का कहना है कि वे चाहते हैं कि जांच निष्पक्ष हो, चाहे दोषी कोई भी निकले। उनके लिए यह राजनीतिक जीत-हार का मामला नहीं, बल्कि आस्था की शुचिता से जुड़ा प्रश्न है।
आगे क्या?
SIT की जांच अभी निर्णायक चरण में नहीं पहुंची है, लेकिन संकेत साफ हैं कि एजेंसी इस बार पुराने मामलों को भी छोड़ने के मूड में नहीं है। अगर ठोस सबूत सामने आते हैं, तो कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है।
यह मामला एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है—क्या धार्मिक संस्थानों के प्रशासन के लिए और कड़े नियमों की जरूरत है? क्या राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित करने का समय आ गया है?
निष्कर्ष
सबरीमला गोल्ड चोरी मामला केवल एक कथित आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि आस्था, प्रशासन और राजनीति के जटिल संबंधों का प्रतीक बन चुका है। SIT की विस्तारित जांच से यह उम्मीद जगी है कि सच सामने आएगा, चाहे वह किसी के भी पक्ष में हो।
अंततः, सबरीमला जैसे पवित्र स्थल की गरिमा तभी बनी रह सकती है, जब वहां का प्रशासन पूरी तरह पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वास योग्य हो। जांच का नतीजा जो भी हो, यह मामला भविष्य में धार्मिक संस्थानों के संचालन को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।