कतरगामा देवालय की स्वर्ण नीलामी: धार्मिक एकता की कसौटी

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पूनम शर्मा
कतरगामा: आस्था का साझा केंद्र

श्रीलंका के दक्षिण-पूर्व में स्थित रुहुणु महा कतरगामा देवालय केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, पहचान और सह-अस्तित्व का जीवंत प्रतीक है। सिंहली बौद्ध इसे कतरगामा देवियो के रूप में पूजते हैं, जबकि तमिल हिंदुओं के लिए यही देवता मुरुगन या स्कंद हैं। मुस्लिम समुदाय इस स्थान को श्रद्धा की दृष्टि से देखता है और वेद्दा आदिवासी समुदाय के लिए यह उनकी परंपराओं से गहराई से जुड़ा है। सदियों से यह मंदिर विविध आस्थाओं को जोड़ता आया है।

स्वर्ण नीलामी की घोषणा और सरकारी तर्क

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में मंदिर के नव-नियुक्त बसनायके निलमे थिलिना मदुशंका ने घोषणा की कि मंदिर के लगभग 70 प्रतिशत स्वर्ण भंडार को नीलाम कर सरकार के ‘रीबिल्डिंग श्रीलंका’ फंड में दिया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब देश गंभीर आर्थिक संकट, विदेशी कर्ज और बुनियादी ढांचे के नुकसान से जूझ रहा है।

प्रशासन का पक्ष: सुरक्षा और राष्ट्रहित

मदुशंका के अनुसार हालिया बाढ़ ने मंदिर की संपत्तियों, विशेषकर स्वर्ण भंडार, को जोखिम में डाल दिया था। उनका तर्क है कि यदि सोना बह जाता या क्षतिग्रस्त हो जाता, तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होता। उनके अनुसार, इस नीलामी का उद्देश्य न केवल संपत्ति को सुरक्षित करना है, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में योगदान देना भी है। समर्थकों का मानना है कि संकट के समय धार्मिक संस्थानों को राष्ट्र के साथ खड़ा होना चाहिए।

विरोध की आवाज़ें और धार्मिक स्वायत्तता का सवाल

हालांकि इस फैसले ने कई समुदायों में चिंता और नाराज़गी भी पैदा की है। विशेष रूप से तमिल हिंदू समुदाय का सवाल है कि क्या मंदिर प्रशासन को यह नैतिक अधिकार है कि वह उन स्वर्ण चढ़ावों को नीलाम करे जो मुरुगन को अर्पित किए गए थे? आलोचकों का कहना है कि यह कदम धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप और आस्थाओं की अनदेखी जैसा प्रतीत होता है।

प्रशासनिक नियंत्रण और असमान शक्ति-संतुलन

कतरगामा देवालय का प्रशासनिक ढांचा मुख्य रूप से बौद्ध परंपरा के अंतर्गत आता है। इसी कारण यह बहस और गहरी हो गई है कि क्या एक धर्म-आधारित प्रशासन को बहुधार्मिक चढ़ावों पर एकतरफा फैसला लेने का अधिकार होना चाहिए। कई लोगों के लिए यह मुद्दा केवल सोने का नहीं, बल्कि सत्ता और प्रतिनिधित्व का है।

सह-अस्तित्व की परंपरा पर मंडराता संकट

कतरगामा हमेशा से श्रीलंका की धार्मिक विविधता और सामंजस्य का प्रतीक रहा है। लेकिन स्वर्ण नीलामी का फैसला इस साझा विरासत पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आलोचकों को डर है कि बिना संवाद के लिए गए ऐसे फैसले भविष्य में धार्मिक विभाजन और अविश्वास को बढ़ा सकते हैं।

समावेशी संवाद की आवश्यकता

कई बुद्धिजीवियों और नागरिक संगठनों का मानना है कि यदि नीलामी अपरिहार्य थी, तो पहले सभी संबंधित समुदायों से संवाद होना चाहिए था। एक अंतर-धार्मिक समिति, पारदर्शी ऑडिट और स्पष्ट उपयोग-योजना इस विवाद को टाल सकती थी। भरोसा तभी बनेगा जब प्रक्रिया में सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो।

पवित्रता का स्वामित्व: एक बुनियादी प्रश्न

यह पूरा विवाद एक गहरे सवाल की ओर इशारा करता है—पवित्रता का मालिक कौन है? क्या राज्य, जो राष्ट्रीय हित का हवाला देता है? क्या मंदिर प्रशासन, जिसे कानूनी अधिकार प्राप्त हैं? या वे श्रद्धालु, जिनकी आस्था और चढ़ावे से यह पवित्रता जीवित रहती है?

निष्कर्ष: विश्वास की परीक्षा

कतरगामा की स्वर्ण नीलामी केवल आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह श्रीलंका की बहुधार्मिक आत्मा की परीक्षा है। यदि इस प्रक्रिया में संवेदनशीलता, पारदर्शिता और संवाद की कमी रही, तो जो स्थल लोगों को जोड़ता रहा है, वही विभाजन का कारण बन सकता है। आर्थिक संकट से उबरने के साथ-साथ श्रीलंका को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसकी साझा आस्थाओं और परंपराओं को ठेस न पहुंचे।

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