पूनम शर्मा
भारतीय लोकतंत्र में “माननीय” शब्द केवल एक संवैधानिक संबोधन नहीं है, बल्कि यह जनता की अपेक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। जब कोई व्यक्ति संसद सदस्य बनता है, तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह शब्दों की गरिमा, तर्क की मर्यादा और सार्वजनिक विमर्श की जिम्मेदारी को समझेगा। इसी संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा दिया गया हालिया बयान—जिसमें उन्होंने कथित रूप से भाजपा को “बैंगन का बच्चा” कहा—एक गहरे सवाल को जन्म देता है: क्या आज की राजनीति में भाषा पूरी तरह विचारहीन हो चुकी है?
महुआ मोइत्रा को एक पढ़ी-लिखी, अंतरराष्ट्रीय अनुभव रखने वाली नेता के रूप में जाना जाता है। विदेश में उच्चस्तरीय नौकरी, प्रतिष्ठित शिक्षा और फिर लोकसभा की सदस्यता—यह यात्रा साधारण नहीं है। इसलिए जब ऐसी पृष्ठभूमि वाली सांसद सार्वजनिक स्थान पर, वह भी देश के गृह मंत्री के कार्यालय के बाहर, इस तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के स्तर पर टिप्पणी बन जाता है।
राजनीति में विरोध, आक्रोश और असहमति स्वाभाविक है। सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन जब विरोध तर्क छोड़कर अश्लील उपमा और जैविक असंभवताओं तक पहुंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। “बैंगन का बच्चा”—यह वाक्य न तो व्यंग्य की ऊंचाई छूता है और न ही राजनीतिक आलोचना की गंभीरता। यह केवल शोर है, जिसमें न विचार है, न दिशा।
विडंबना यह है कि जिस सांसद को अक्सर संविधान, संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की बात करते हुए देखा जाता है, वही सांसद भाषा की मर्यादा को इस हद तक तोड़ देती हैं। यदि यही वक्तव्य किसी सत्तापक्ष के नेता ने दिया होता, तो शायद उसे असंवैधानिक, अशोभनीय और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाता। लेकिन जब यह विपक्ष की ओर से आता है, तो उसे “भावनात्मक प्रतिक्रिया” कहकर टाल दिया जाता है। यही दोहरा मापदंड भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी बन चुका है।
इस पूरे प्रसंग में एक और दिलचस्प पहलू सामने आता है—मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को “टाइगर क्यूब” यानी बाघ का बच्चा बताना। यह बयान शायद प्रशंसा के उद्देश्य से दिया गया हो, लेकिन यह भी उसी प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें राजनीति को प्रतीकों और जैविक रूपकों में बदल दिया गया है। नेता इंसान नहीं, जानवरों के प्रतीक बनते जा रहे हैं—कोई शेर है, कोई बाघ, कोई सांप और कोई अब सब्ज़ी का “बच्चा”।
यह भाषा केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने तक सीमित नहीं रहती; यह समाज के बौद्धिक स्तर को भी नीचे खींचती है। जब संसद सदस्य इस तरह की बातें कहते हैं, तो संदेश यह जाता है कि तर्क की जरूरत नहीं, अपमान ही पर्याप्त है। इससे न युवा राजनीति सीखते हैं, न जनता को कोई समाधान मिलता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि महुआ मोइत्रा अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुखर समर्थक रही हैं। लेकिन स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। शब्दों की आज़ादी का अर्थ यह नहीं कि सार्वजनिक मंच पर कुछ भी कहा जाए, चाहे उसका कोई अर्थ हो या नहीं।
यह लेख किसी व्यक्ति की निजी ज़िंदगी, धर्म या व्यक्तिगत विकल्पों पर टिप्पणी नहीं करता। सवाल केवल सार्वजनिक आचरण का है। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तब प्रभावी होती है जब वह तर्क पर आधारित हो, न कि हास्यास्पद उपमाओं पर।
आज भारतीय राजनीति को गुस्से की नहीं, समझ की जरूरत है। चिल्लाने की नहीं, संवाद की जरूरत है। और सबसे ज्यादा जरूरत है भाषा की गरिमा को बचाए रखने की। क्योंकि जब शब्द गिरते हैं, तो विचार भी गिरते हैं—और फिर लोकतंत्र केवल शोर बनकर रह जाता है।
“बैंगन का बच्चा” जैसी पंक्तियां शायद कुछ पलों के लिए सुर्खियां बना लें, लेकिन इतिहास में वे केवल इस बात के उदाहरण के रूप में दर्ज होंगी कि कैसे एक गंभीर लोकतंत्र में भाषा का स्तर गिरता चला गया। सवाल यह नहीं है कि यह बयान किसने दिया, सवाल यह है कि क्या हम इसे स्वीकार करने को तैयार हैं?
अगर जवाब “नहीं” है, तो आलोचना केवल एक सांसद की नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति की होनी चाहिए।