पूनम शर्मा
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के भीतर जो हलचल दिख रही है, वह किसी एक देश या संस्था तक सीमित नहीं है। यह एक गहरे बदलाव का संकेत है—ऐसा बदलाव, जिसे अब तक दबाया गया, टाला गया और मज़ाक में उड़ाया गया। लेकिन अब वही व्यवस्था अपने ही शब्दों से पलटती दिख रही है। अमेरिका के बड़े बैंक, विशेषकर JP Morgan, चुपचाप दुनिया भर से फिजिकल सिल्वर खरीद रहे हैं। यह कोई सामान्य निवेश नहीं है, न ही यह महज़ पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन है। यह एक स्वीकारोक्ति है—कि जिस पेपर आधारित वित्तीय ढांचे पर दशकों तक दुनिया को भरोसा करने को कहा गया, वह अब भरोसे के लायक नहीं रहा।
सिल्वर की कीमत और दशकों की ‘नियोजित चुप्पी’
करीब 70 वर्षों तक सिल्वर की कीमतें अस्वाभाविक रूप से दबाई जाती रहीं। माँग बढ़ती रही, लेकिन कीमतें वहीं अटकी रहीं। यह बाज़ार का नियम नहीं था, बल्कि बाज़ार की साज़िश थी। बड़े बैंक और संस्थागत खिलाड़ी फ्यूचर्स, डेरिवेटिव्स और पेपर ट्रेडिंग के ज़रिए कीमतों को मनचाहे स्तर पर रोके रखते थे। JP Morgan पर खुद सिल्वर मार्केट में हेरफेर के लिए भारी जुर्माना लग चुका है। यह कोई आरोप नहीं, बल्कि स्थापित तथ्य है। मकसद साफ था—कीमती धातुओं को कमज़ोर दिखाना, ताकि डॉलर और पेपर एसेट्स मजबूत नज़र आएँ।
इसी दौरान भारत जैसे देशों का मज़ाक उड़ाया गया। कहा गया कि भारतीय “पुराने ज़माने” के हैं—सोना-चाँदी घर में रखते हैं, बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा नहीं करते। लेकिन आज वही बैंक उसी “पुरानी सोच” को अपनाने पर मजबूर हो गए हैं।
क्यों अचानक फिजिकल सिल्वर की होड़ मच गई?
आज स्थिति बदल चुकी है। सिल्वर अब केवल ज्वेलरी या निवेश का माध्यम नहीं है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है—सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर, मेडिकल टेक्नोलॉजी और डिफेंस—हर जगह सिल्वर की जरूरत बढ़ रही है।
समस्या यह है कि माँग बढ़ रही है, लेकिन सप्लाई घट रही है। ग्लोबल माइनिंग प्रोडक्शन गिर रहा है, ग्रेड्स कमजोर हो रहे हैं, और नई खदानें सीमित हैं। पहली बार ऐसा हो रहा है कि दुनिया जितना सिल्वर इस्तेमाल कर रही है, उससे कम पैदा हो रहा है।
इस असंतुलन को बैंक और सरकारें साफ देख रही हैं। इसलिए अब वे पेपर सिल्वर नहीं, फिजिकल सिल्वर चाहते हैं—वह भी किसी भी कीमत पर।
भारत-चीन बनाम पश्चिमी पेपर सिस्टम
भारत और चीन ने कभी पूरी तरह पेपर सिस्टम पर भरोसा नहीं किया। भारत में आज भी परिवारों के पास सोना-चाँदी है—पीढ़ियों से जमा किया हुआ। यह “अनपढ़ निवेश” नहीं, बल्कि संकट प्रबंधन की पारंपरिक समझ है।
अब जब पश्चिमी बैंक खुद फिजिकल एसेट्स की ओर भाग रहे हैं, तो साफ है कि खेल बदल चुका है। डॉलर की ताकत सवालों के घेरे में है, और असली मूल्य फिर से असली धातुओं में लौट रहा है। यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा, लेकिन दिशा साफ है।जो केवल काग़ज़ी वादों पर टिके हैं, वे असुरक्षित हैं।
और जिनके पास असली संपत्ति है—सोना, चाँदी, ज़मीन—वे आने वाले समय में मजबूत स्थिति में होंगे।
इतिहास एक बार फिर साबित कर रहा है: जो चीज़ सदियों तक टिकती है, वही अंत में जीतती है।