उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची संशोधन

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पूनम शर्मा
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के तहत जारी की गई ड्राफ्ट मतदाता सूची ने राज्य की विरोध की राजनीति में हलचल मचा दी है। 6 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित इस सूची में लगभग 2.8 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खुलासा हुआ, जो कुल मतदाता संख्या का करीब 18.7 प्रतिशत है। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है,यह प्रशासनिक सफाई है या इसके दूरगामी राजनीतिक असर होंगे?

आंकड़ों की कहानी: कागज़ों से गायब करोड़ों अवैध वोटर

ड्राफ्ट मतदाता सूची के अनुसार, उत्तर प्रदेश में अब कुल मतदाताओं की संख्या 12.5 करोड़ रह गई है, जबकि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित सूची में यह आंकड़ा 15.4 करोड़ था। यानी कुछ ही महीनों में राज्य की मतदाता संख्या में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। यह संख्या 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों तथा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों से भी कम है।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के अनुसार, प्रदेश के 1.62 लाख बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाताओं को गणना फॉर्म वितरित किए। इनमें से करीब 81.3 प्रतिशत मतदाताओं ने फॉर्म लौटाए, जबकि 18.7 प्रतिशत फॉर्म ‘अनकलेक्टेबल’ रहे। इन अनकलेक्टेबल मामलों में 1.29 करोड़ मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित बताए गए, 46 लाख मृत पाए गए, 25 लाख डुप्लीकेट थे और 79 लाख मतदाता ऐसे रहे जो ट्रेस नहीं हो सके।

इसके अलावा, लगभग 7.7 लाख मतदाताओं ने फॉर्म लेकर भी वापस नहीं किए। यही वे नाम हैं, जो फिलहाल ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए हैं।

जिलों में असमान असर: कहीं 30 प्रतिशत तो कहीं 10 प्रतिशत कटौती

इस संशोधन का असर पूरे प्रदेश में एक जैसा नहीं रहा। 75 जिलों में से 17 जिलों में 20 प्रतिशत से ज्यादा नाम हटाए गए। राजधानी लखनऊ में सबसे अधिक 30.04 प्रतिशत मतदाताओं के नाम कटे, जो करीब 12 लाख से ज्यादा हैं। गाजियाबाद, बलरामपुर, कानपुर नगर और प्रयागराज जैसे बड़े जिलों में भी 25 प्रतिशत के आसपास कटौती दर्ज की गई।

इसके उलट, बुंदेलखंड के कुछ जिलों जैसे महोबा, हमीरपुर और ललितपुर में यह आंकड़ा 10 से 12 प्रतिशत के बीच रहा। यह असमानता अपने आप में कई सवाल खड़े करती है—क्या शहरी इलाकों में प्रवास और डुप्लीकेशन ज्यादा है, या फिर प्रशासनिक चूक?

राजनीतिक खलबली

ड्राफ्ट सूची सामने आने से पहले ही इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक पार्टी बैठक में स्वीकार किया कि “85 से 90 प्रतिशत हटाए गए नाम हमारे समर्थकों के हो सकते हैं।” यह बयान बताता है कि सत्तारूढ़ दल भी इस प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं है।

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि SIR के ज़रिये चुपचाप NRC लागू किया जा रहा है जो कि हास्यास्पद है । कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इस प्रक्रिया को “जल्दबाज़ी और असंवैधानिक” करार दिया, वहीं सपा के एक अन्य नेता ने उल्टा दावा किया कि हटाए गए मतदाता ज्यादातर भाजपा समर्थक थे।

इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 6 जनवरी से 6 फरवरी तक दावे और आपत्तियों की अवधि खोल दी है। जिन मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, वे फॉर्म-6 भरकर दोबारा नाम जुड़वा सकते हैं। अब तक करीब 15 लाख आवेदन आ चुके हैं, जो बताता है कि बड़ी संख्या में लोग सक्रिय होकर अपने अधिकार को बचाने में जुटे हैं।

आगे की राह: भरोसे की बहाली जरूरी

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहां की मतदाता सूची में इतनी बड़ी कटौती केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह जाती, बल्कि यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि बिना उचित प्रक्रिया के किसी का नाम अंतिम सूची से नहीं हटेगा। अंतिम मतदाता सूची 6 मार्च 2026 को प्रकाशित होगी।

अब असली चुनौती यह है कि आम मतदाता तक सही जानकारी पहुँचे और कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ चुनाव कराने में नहीं, बल्कि हर नागरिक को उसकी आवाज़ देने में है।

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